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Sunday, September 16, 2012

गलत होता व्याकरण



गलत होता व्याकरण :: Galat Hota Vyaakaran

By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

Please write to me at :
pkk@lifekingsize.com

गलत होता व्याकरण
 पी. के. खुराना

हर भारतीय चाहता है कि भारतवर्ष उन्नति करे, एक विकसित देश बने और देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सारी सुविधाएं मौजूद हों। इसके लिए हमें गहन विचार की आवश्यकता है। गड़बड़ सिर्फ यह है कि हम सिर्फ विचार ही करते रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ते। भारत में हम चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सम्मेलन करते हैं, सेमिनार करते हैं खूब बातें करते हैं और इस तरह जताते हैं मानो किसी भी जनसुविधा का सुधार हमारा काम न हो, और नतीजतन बिलकुल भी कार्य नहीं करते हैं।

श्री सी. के. प्रह्लाद ने एक बार इन्फोसिस के चीफ मेंटर श्री नारायणमूर्ति से कहा था – ‘विकासशील देश होना महज एक मानसिकता है।’ श्री नारायणमूर्ति की तरह मैं भी इस कथन से सहमत हूं। श्री नारायणमूर्ति कहते हैं कि सत्तर के दशक में जब वे फ्रांस गए तो उन्होंने विकसित देश और विकासशील देश की मानसिकता का फर्क स्पष्ट देखा। फ्रांस में हर कोई इस तरह दिखाता है मानो जनसुविधाएं सुधारने पर चर्चा करना, बहस करना और उस दिशा में फटाफट काम करना उनका ही काम हो। भारत में हम इसके एकदम विपरीत काम करते हैं। हम या तो उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं या फिर सिर्फ चर्चा करते रह जाते हैं। हमारे यहां तो प्रधानमंत्री भी भाषण करते हैं तो वे कहते हैं – ‘गरीबी दूर होनी चाहिए!’ मानो, भारत की गरीबी दूर करना बराक ओबामा का काम हो!

आज हमारी मानसिकता गलत है, व्याकरण गलत है। ‘ऐसा होना चाहिए’, ‘वैसा होना चाहिए’ आदि को छोड़कर हमें अब ‘मैं करूंगा’ पर आने की ज़रूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि पुराना ज़माना पुराना था, वह बीत गया। अब ज़माना बदल गया है। नये दौर और नये ज़माने की ज़रूरतें नई होती हैं, समस्याएं नई होती हैं और नई समस्याओं के समाधान पुराने नहीं हो सकते।

अलग-अलग समय में अलग-अलग चीजों का महत्व होता है। कभी बड़ी जनसंख्या एक वरदान था क्योंकि उससे श्रमशक्ति बढ़ जाती थी, फिर एक ज़माना ऐसा आया जब ज़मीन और खेती संपदा के कारण बने। उसके बाद कारखाने और मिल बड़ी संपदा बन गए। आज के ज़माने में सूचना, ज्ञान और नेटवर्किंग संपदा हैं। पुराना ज़माना बीत जाए तो उसकी यादों से चिपके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। अपने अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को सुखद बनाना तो सार्थक है पर सुनहरे अतीत पर घमंड करना और वर्तमान की उपेक्षा करना हानिकारक है। समस्या यह है कि भारतवर्ष में सोने की चिडिय़ा के अतीत की कहानियां सुनना-सुनाना तो आम बात है पर वर्तमान का विश्लेषण करना और नये ज़माने की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को शिक्षित करना, योजना बनाना और कार्य संपन्न करना शायद दूसरी दुनिया के लोगों पर छोड़ दिया गया है।

हम सोने की चिडिय़ा थे। हमने शून्य का आविष्कार किया, गिनती उसी से बनी। पुरातन काल में हमारा विज्ञान उन्नत था। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि पांच हज़ार वर्ष पूर्व भी हमारे यहां विमान थे। ऐसा माना जाता है कि रावण के पास पुष्पक विमान था और वह दूर की यात्राएं वायुमार्ग से करता था। हमारी युद्ध कला बहुत उन्नत थी, हमारे योद्धाओं के पास अग्निबाण जैसे आग बरसाने वाले या पानी बरसाने वाले या नागपाश की तरह बांध लेने वाले अस्त्र-शस्त्र थे। हमारी चिकित्सा पद्धति भी बहुत उन्नत थी। हमारे वैज्ञानिक, भूगोलविद्, खगोलविद् आदि विद्वानों ने संसार को ज्ञान और आविष्कारों का एक बड़ा खज़ाना दिया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। हमें अपनी विरासत पर गर्व होना ही चाहिए। इसमें कुछ भी गलत अथवा अस्वाभाविक नहीं है। पर क्या इतना ही काफी है?

श्री नारायणमूर्ति उन गिने-चुने भारतीयों में से एक हैं जो पूर्ण पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। खुद उनका जीवन एक खुली किताब है। वे एक अच्छे इन्सान ही नहीं, एक आदर्श देशभक्त भी हैं और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे वे न करते हों, या जिसे करने में वे विश्वास न करते हों। श्री नारायणमूर्ति ने अनेक बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, दक्षिणपंथियों, मध्यमार्गियों, वामपंथियों से बात की, अध्ययन किया, निरीक्षण किया, डाटा इकट्ठा किया और दुनिया में गरीबी मिटाने और आर्थिक विकास के मूलभूत उपायों का विश्लेषण करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले। उनका निष्कर्ष था कि गरीबी की समस्या का एकमात्र समाधान अच्छी आय वाली नौकरियों के अवसर पैदा करना है। इसके लिए ऐसे उद्यमी चाहिएं जो धारणाओं को अवसर और धन में बदल सकें। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और तथाकथित बिजनेस स्कूल भी विद्यार्थियों को नौकरी के लिए या अच्छे वेतन वाली नौकरी के लिए तो तैयार करते हैं पर वे उन्हें उद्यमी नहीं बनाते। ज्यादातर शिक्षित व्यक्ति क्लर्क, अफसर, मैनेजर या चीफ मैनेजर बनने का सपना देखते हैं, उद्यमी बनने का नहीं। नौकरीपेशा व्यक्ति को सिर्फ स्वयं को रोजगार मिलता है जबकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई अन्य लोगों के रोज़गार का भी कारण बनता है। गरीबी दूर करने का यह रामबाण उपाय है।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि विकास गरीबों की कीमत पर नहीं हो सकता। हमें सहृदय पूंजीवाद और इन्क्लूसिव डेवेलपमेंट को अपनाना होगा। ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिएं जो आम लोग खरीद सकें। इसके साथ ही गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाने के ठोस उपाय भी किये जाएं। रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के अलावा उत्पादन और वितरण का ऐसा माडल तैयार करना होगा जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े और सामान भी सस्ते हों। यह नयी सामाजिक व्यवस्था, दृष्टिकोण में परिवर्तन तथा सोशल इन्नोवेशन से संभव है। आम आदमी, सामाजिक संगठन और कारपोरेट घराने ऐसा कर सकते हैं।

जब मैं सामाजिक व्यवस्था की बात करता हूं तो मेरी कल्पना में राजा अग्रसेन आते हैं जिनके राज्य में यह नियम था कि यदि वहां कोई बाहरी व्यक्ति आये तो राज्य का हर व्यक्ति उसे एक रुपया और एक ईंट भेंट स्वरूप देता था ताकि उन ईंटों से वह अपना घर बना सके और उन रुपयों से अपना व्यवसाय जमा सके। यह एक सामाजिक व्यवस्था थी जहां हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति की सफलता के लिए योगदान देता था। इसी तरह सहृदय पूंजीवाद के माध्यम से वंचितों के विकास के लिए साधन बनाने होंगे। सहृदय पूंजीवाद में लाभ के धन का एक भाग समाज और देश के विकास में लगता है। यह तभी संभव है जब हम ‘चाहिए’ का व्याकरण छोड़कर ‘मैं करूंगा’ का व्याकरण अपना लें, तभी हम उन्नति कर सकेंगे और एक विकसित देश बन सकेंगे। 



Sunday, February 19, 2012

गलत होता व्याकरण




गलत होता व्याकरण :: Galat Hota Vyaakaran

By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना


Please write to me at :
pkk@lifekingsize.com



गलत होता व्याकरण
 पी. के. खुराना


हर भारतीय चाहता है कि भारतवर्ष उन्नति करे, एक विकसित देश बने और देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सारी सुविधाएं मौजूद हों। इसके लिए हमें गहन विचार की आवश्यकता है। गड़बड़ सिर्फ यह है कि हम सिर्फ विचार ही करते रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ते। भारत में हम चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सम्मेलन करते हैं, सेमिनार करते हैं खूब बातें करते हैं और इस तरह जताते हैं मानो किसी भी जनसुविधा का सुधार हमारा काम न हो, और नतीजतन बिलकुल भी कार्य नहीं करते हैं।

श्री सी. के. प्रह्लाद ने एक बार इन्फोसिस के चीफ मेंटर श्री नारायणमूर्ति से कहा था – ‘विकासशील देश होना महज एक मानसिकता है।’ श्री नारायणमूर्ति की तरह मैं भी इस कथन से सहमत हूं। श्री नारायणमूर्ति कहते हैं कि सत्तर के दशक में जब वे फ्रांस गए तो उन्होंने विकसित देश और विकासशील देश की मानसिकता का फर्क स्पष्ट देखा। फ्रांस में हर कोई इस तरह दिखाता है मानो जनसुविधाएं सुधारने पर चर्चा करना, बहस करना और उस दिशा में फटाफट काम करना उनका ही काम हो। भारत में हम इसके एकदम विपरीत काम करते हैं। हम या तो उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं या फिर सिर्फ चर्चा करते रह जाते हैं। हमारे यहां तो प्रधानमंत्री भी भाषण करते हैं तो वे कहते हैं – ‘गरीबी दूर होनी चाहिए!’ मानो, भारत की गरीबी दूर करना बराक ओबामा का काम हो!

आज हमारी मानसिकता गलत है, व्याकरण गलत है। ‘ऐसा होना चाहिए’, ‘वैसा होना चाहिए’ आदि को छोड़कर हमें अब ‘मैं करूंगा’ पर आने की ज़रूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि पुराना ज़माना पुराना था, वह बीत गया। अब ज़माना बदल गया है। नये दौर और नये ज़माने की ज़रूरतें नई होती हैं, समस्याएं नई होती हैं और नई समस्याओं के समाधान पुराने नहीं हो सकते।

अलग-अलग समय में अलग-अलग चीजों का महत्व होता है। कभी बड़ी जनसंख्या एक वरदान था क्योंकि उससे श्रमशक्ति बढ़ जाती थी, फिर एक ज़माना ऐसा आया जब ज़मीन और खेती संपदा के कारण बने। उसके बाद कारखाने और मिल बड़ी संपदा बन गए। आज के ज़माने में सूचना, ज्ञान और नेटवर्किंग संपदा हैं। पुराना ज़माना बीत जाए तो उसकी यादों से चिपके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। अपने अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को सुखद बनाना तो सार्थक है पर सुनहरे अतीत पर घमंड करना और वर्तमान की उपेक्षा करना हानिकारक है। समस्या यह है कि भारतवर्ष में सोने की चिडिय़ा के अतीत की कहानियां सुनना-सुनाना तो आम बात है पर वर्तमान का विश्लेषण करना और नये ज़माने की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को शिक्षित करना, योजना बनाना और कार्य संपन्न करना शायद दूसरी दुनिया के लोगों पर छोड़ दिया गया है।

हम सोने की चिडिय़ा थे। हमने शून्य का आविष्कार किया, गिनती उसी से बनी। पुरातन काल में हमारा विज्ञान उन्नत था। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि पांच हज़ार वर्ष पूर्व भी हमारे यहां विमान थे। ऐसा माना जाता है कि रावण के पास पुष्पक विमान था और वह दूर की यात्राएं वायुमार्ग से करता था। हमारी युद्ध कला बहुत उन्नत थी, हमारे योद्धाओं के पास अग्निबाण जैसे आग बरसाने वाले या पानी बरसाने वाले या नागपाश की तरह बांध लेने वाले अस्त्र-शस्त्र थे। हमारी चिकित्सा पद्धति भी बहुत उन्नत थी। हमारे वैज्ञानिक, भूगोलविद्, खगोलविद् आदि विद्वानों ने संसार को ज्ञान और आविष्कारों का एक बड़ा खज़ाना दिया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। हमें अपनी विरासत पर गर्व होना ही चाहिए। इसमें कुछ भी गलत अथवा अस्वाभाविक नहीं है। पर क्या इतना ही काफी है?

श्री नारायणमूर्ति उन गिने-चुने भारतीयों में से एक हैं जो पूर्ण पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। खुद उनका जीवन एक खुली किताब है। वे एक अच्छे इन्सान ही नहीं, एक आदर्श देशभक्त भी हैं और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे वे न करते हों, या जिसे करने में वे विश्वास न करते हों। श्री नारायणमूर्ति ने अनेक बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, दक्षिणपंथियों, मध्यमार्गियों, वामपंथियों से बात की, अध्ययन किया, निरीक्षण किया, डाटा इकट्ठा किया और दुनिया में गरीबी मिटाने और आर्थिक विकास के मूलभूत उपायों का विश्लेषण करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले। उनका निष्कर्ष था कि गरीबी की समस्या का एकमात्र समाधान अच्छी आय वाली नौकरियों के अवसर पैदा करना है। इसके लिए ऐसे उद्यमी चाहिएं जो धारणाओं को अवसर और धन में बदल सकें। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और तथाकथित बिजनेस स्कूल भी विद्यार्थियों को नौकरी के लिए या अच्छे वेतन वाली नौकरी के लिए तो तैयार करते हैं पर वे उन्हें उद्यमी नहीं बनाते। ज्यादातर शिक्षित व्यक्ति क्लर्क, अफसर, मैनेजर या चीफ मैनेजर बनने का सपना देखते हैं, उद्यमी बनने का नहीं। नौकरीपेशा व्यक्ति को सिर्फ स्वयं को रोजगार मिलता है जबकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई अन्य लोगों के रोज़गार का भी कारण बनता है। गरीबी दूर करने का यह रामबाण उपाय है।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि विकास गरीबों की कीमत पर नहीं हो सकता। हमें सहृदय पूंजीवाद और इन्क्लूसिव डेवेलपमेंट को अपनाना होगा। ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिएं जो आम लोग खरीद सकें। इसके साथ ही गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाने के ठोस उपाय भी किये जाएं। रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के अलावा उत्पादन और वितरण का ऐसा माडल तैयार करना होगा जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े और सामान भी सस्ते हों। यह नयी सामाजिक व्यवस्था, दृष्टिकोण में परिवर्तन तथा सोशल इन्नोवेशन से संभव है। आम आदमी, सामाजिक संगठन और कारपोरेट घराने ऐसा कर सकते हैं।

जब मैं सामाजिक व्यवस्था की बात करता हूं तो मेरी कल्पना में राजा अग्रसेन आते हैं जिनके राज्य में यह नियम था कि यदि वहां कोई बाहरी व्यक्ति आये तो राज्य का हर व्यक्ति उसे एक रुपया और एक ईंट भेंट स्वरूप देता था ताकि उन ईंटों से वह अपना घर बना सके और उन रुपयों से अपना व्यवसाय जमा सके। यह एक सामाजिक व्यवस्था थी जहां हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति की सफलता के लिए योगदान देता था। इसी तरह सहृदय पूंजीवाद के माध्यम से वंचितों के विकास के लिए साधन बनाने होंगे। सहृदय पूंजीवाद में लाभ के धन का एक भाग समाज और देश के विकास में लगता है। यह तभी संभव है जब हम ‘चाहिए’ का व्याकरण छोड़कर ‘मैं करूंगा’ का व्याकरण अपना लें, तभी हम उन्नति कर सकेंगे और एक विकसित देश बन सकेंगे। 

Population : Boon or Bane / जनसंख्या : समस्या अथवा वरदान




Population : Boon or Bane
जनसंख्या : समस्या अथवा वरदान


By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

Please write to me at :
pkk@lifekingsize.com


जनसंख्या : समस्या अथवा वरदान -- पी. के. खुराना

जनसंख्या के लिहाज़ से भारतवर्ष विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। आबादी के आकार की बात करें तो हमारा देश अमरीका, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, पाकिस्तान, बांग्लादेश और जापान की सम्मिलित आबादी के बराबर है और पिछले 10 वर्षों में हमारे देश की जनसंख्या में एक पूरे देश ब्राज़ील की जनसंख्या और जुड़ गई है। जनसंख्या बढऩे का मतलब है कि हमें ज्यादा लोगों के शिक्षा के साधन, रोज़गार, खाना और रहने के लिए मकान चाहिएं। हमारे देश में बहुत सी समस्याएं हैं, जनसंख्या की समस्या उनमें से बहुतों का मूल है, पर यह भी सच है कि ज्यादा आबादी के कारण आज हम लाभ की स्थिति में भी हैं।

भारतवर्ष में 15 वर्ष से 59 वर्ष के लोगों की वृद्धि का अनुपात आबादी की वृद्धि के अनुपात से अधिक है और यह स्थिति 2030 तक बने रहने की उम्मीद है। यह वह आबादी है जो काम में लगी है अथवा काम में लगाई जा सकती है। ऐसी जनसंख्या वाला भारत एकमात्र विकासशील देश है।

आज हमारे सामने सवाल यह है कि जनसंख्या के इस वर्ग को काम में लगाकर हम इसे अपने लिए वरदान बना लेंगे या फिर राजनेताओं की थोथी बयानबाज़ी और अपनी खुद की लापरवाही, अकर्मण्यता तथा अज्ञान के कारण बढ़ती आबादी को अपने लिए अभिशाप बना लेंगे तथा वर्तमान से भी ज्य़ादा गरीबी तथा साधनहीनता की स्थिति में पहुंच जाएंगे। हमारे सामने यह एक बड़ी चुनौती है, और यही एक बड़ा अवसर भी है।

फ्रेंच पोलिटिकल सांइटिस्ट क्रिस्टोफर जैफरेलो दक्षिण-पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ हैं और भारत-पाकिस्तान पर उनकी खास पकड़ है। उनकी संपादित पुस्तक ‘इंडिया सिंस 1950 : सोसाइटी, पॉलिटिक्स, इकोनामी एंड कल्चर’ में भारत का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विश्लेषण किया गया है। इसी पुस्तक के अध्याय ‘इंडिया 2025’ के अनुसार भारतवर्ष उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक संभावनाओं वाला देश है। यहां न सिर्फ राजनीतिक स्थिरता है बल्कि यहां लोकतंत्र के साथ बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था भी है। हालांकि भारत की विकास दर यदा-कदा ही दोहरे अंक तक पहुंच सकी है लेकिन पिछले दस वर्षों से यह 7-8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। जीडीपी के लिहाज से 2025 तक हमारा देश अमरीका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा देश बन जाएगा। बचत और निवेश की अच्छी दर का भी भारत को लाभ मिलेगा और सन् 2020 तक देश की उत्पादकता भी बढ़ती रहने के संकेत हैं।

विद्वानों का मानना है कि उत्पादकता बढऩे के पांच मुख्य कारण हैं। एक, अर्थव्यवस्था में कृषि की जगह उद्योग और सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी; दो, विश्व अर्थव्यवस्था में भारतीय कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी; तीन, बैंकिंग सेक्टर का आधुनिकीकरण; चार, आईटी टूल्स का बढ़ता इस्तेमाल; और पांच, संचार व परिवहन के साधनों का विकास।

क्या भारतीय अर्थव्यवस्था इसी रफ्तार से आगे बढ़ सकती है? अगर हां, तो आने वाले वर्षों में इसके क्या समाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे? एक चुनौती तो स्पष्ट रूप से बढ़ती असमानता है। यह असमानता सिर्फ सामाजिक स्तर पर नहीं, बल्कि भौगोलिक स्तर पर भी है। ग्रामीण भारत आगे नहीं बढ़ रहा है। इससे ग्रामवासियों में शहरी मध्यवर्ग के मुकाबले गहरी हताशा पैठ सकती है और यह असंतोष माओवादियों अथवा ऐसे ही अन्य संगठनों के पक्ष में जा सकता है। हमारी चुनौती यह है कि आबादी को हम बोझ न बनने दें बल्कि उसे परिसंपत्ति में परिवर्तित कर दें।

माना जाता है कि भारत की आबादी इक्कीसवीं सदी के मध्य तक चीन को पार कर डेढ़ अरब हो जाएगी। साल 2025 तक कामकाजी वर्ग की आबादी मे 25 करोड़ लोगों का इज़ाफा होगा। इसका अर्थ है कि भारत अन्य देशों के मुकाबले में युवा रहेगा और शायद वेतन भी कम रखने की स्थिति में होगा। इस वर्ग को परिसंपत्ति बनाने के लिए हमें शिक्षा सुविधाओं का तेज विकास करना होगा और नए रोजगार पैदा करने होंगे। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा ऐसी हो जिससे कृषक वर्ग भी लाभान्वित हो सके। आबादी में हर साल एक करोड़ सत्तर लाख लोगों के जुडऩे का मतलब है कि खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनने के लिए हमें कृषि उत्पादन में सालाना 4 से 4.5 प्रतिशत तक की वृद्धि सुनिश्चित करनी होगी। उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में पिछले दस वर्षों में कृषि उत्पादन गिरा है। राष्ट्रीय स्तर पर गेहूं और चावल का उत्पादन स्थिर हो गया है। इससे प्रति व्यक्ति अनाज और दालों की उपलब्धता घटी है। इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता है।

कमज़ोर इन्फ्रास्ट्रक्चर एक अहम अड़चन है। सड़कों और रेलों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। ऊर्जा की स्थिति और भी संकटपूर्ण है। कोयले और तेल की बढ़ती खपत का संकट अलग से है। परिणामस्वरूप बिजली की कटौती जारी रहने की आशंका है। ऐसे में बढ़ती आबादी का बड़ा हिस्सा बेरोज़गार, अर्धशिक्षित अथवा अशिक्षित तथा साधनहीन होगा। इस स्थिति को न बदला गया तो बढ़ती आबादी सचमुच अभिशाप बन जाएगी। स्थिति को बदलने के लिए सबसे पहले कस्बों और गांवों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के तेज विकास के लिए काम करना होगा, उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवानी होंगी तथा उन्हें रोज़गारपरक उद्यमिता की शिक्षा देनी होगी। कंज्य़ूमर गुड्स कंपनियों को आज ग्रामीण भारत में बड़ा बाज़ार नज़र आ रहा है। इस बाज़ार को बढ़ाने के लिए यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में योगदान उनके अपने हित में है। विभिन्न सरकारें भी इस ओर ध्यान दें तो समाज में असमानता नहीं होगी तथा सामाजिक विघटन का खतरा नहीं रहेगा। हमारी अधिकांश आबादी कामकाजी होगी तो गरीबी मिटेगी, देश समृद्ध होगा और उसके कारण भी इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा। यह एक ऐसा सार्थक चक्र होगा जो देश को विकास की नई दिशा देगा और हमें विकसित देश बनने में मददगार साबित होगा।

अगर हमने ऐसा न किया तो यह आबादी अभिशाप बन जाएगी, स्लग एरिया बढ़ेगा, चोरियां, हत्याएं और सभी तरह के अपराध बढ़ेंगे, गांवों को विकास नहीं होगा और शहरों का जीवन असुरक्षित हो जाएगा। हमें याद रखना चाहिए कि गरीबी और विकास के बीच चुनाव हमें करना है, परिणाम भी हम ही भुगतेंगे। 

Alternative Journalism, Alternative Journalism in India, Pioneering Alternative Journalism, Pioneering Alternative Journalism in India, Pioneering Alternative Journalism in India : PK Khurana, Alternative Journalism and PK Khurana, भारत में वैकल्पिक पत्रकारिता, वैकल्पिक पत्रकारिता, भारत में वैकल्पिक पत्रकारिता के जनक, वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रवर्तक, भारतवर्ष में वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रवर्तक, भारतवर्ष में वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रवर्तक पी. के. खुराना