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Saturday, November 24, 2012

तमसो मा ज्योतिर्गमय




तमसो मा ज्योतिर्गमय
                                                                                                        l पी. के. खुराना
तमसो मा ज्योतिर्गमय, यानी, 'हे प्रभु, हमें अंधकार से प्रकाश में ले चल!’ -- यह हमारी शाश्वत प्रार्थना है। अंधकार से प्रकाश की ओर की यात्रा अज्ञान से ज्ञान की ओर की यात्रा है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि अज्ञानवश और काम तथा पारिवारिक  जि़म्मेदारियों के बोझ तले दब कर तथा आधुनिक जीवन शैली के कारण हम जिस प्रकाश की उपेक्षा कर रहे हैं, उससे हम अपना कितना नुकसान करते हैं? यहां हम सूर्य के प्रकाश की बात कर रहे हैं।
सूर्य का प्रकाश इतना स्वास्थ्यकर माना जाता है कि प्राचीन भारतीय योग गुरुओं ने सूर्य नमस्कार के रूप में हमें सूर्य की ऊर्जा का लाभ लेने की शिक्षा दी। सूर्य का प्रकाश विटामिन-डी का भंडार है और अक्सर नवजात बच्चों को सुबह सवेरे वस्त्ररहित स्थिति में सूर्य की रोशनी में रखा जाता है। खेद की बात है कि आधुनिक जीवन शैली ने हमसे यह सुविधा छीन ली है और शहरों में रहने वाली आबादी का एक बड़ा भाग सूर्य के दर्शन ही नहीं करता।
शहरी जीवन में ऊंची अट्टालिकाओं में बने कार्यालय, एक ही मंजिल पर कई-कई कार्यालयों के होने से हर कार्यालय में सूर्य के प्रकाश की सीधी पहुंच की सुविधा नहीं है। यही नहीं, जहां यह सुविधा है, वहां भी बहुत से लोग भारी परदों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को बाहर रोक देते हैं और ट्यूबलाइट तथा एयर कंडीशनर में काम करना पसंद करते हैं। घर से कार्यालय के लिए सुबह जल्दी निकलना होता है। हम बस पर जाएं, ट्रेन पर जाएं या अपनी कार से जाएं, गाड़ी में बैठे रहने पर सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होता, अधिकांश कार्यालयों में सूर्य का प्रकाश नहीं होता और शाम को दफ्तर से छुट्टी के समय भी फिर गाड़ी का लंबा सफर हमें सूर्य के प्रकाश से वंचित कर देता है। घर आकर हम परिवार अथवा टीवी में यूं गुम हो जाते हैं कि सूर्य के प्रकाश की परवाह नहीं रहती। इस प्रकार हम प्रकृति के एक अनमोल उपहार से स्वयं को वंचित रख रहे हैं और अपने स्वास्थ्य का नुकसान कर रहे हैं।
इसी समस्या का एक और पहलू भी है जिसका पूरे वातावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। औद्योगिक विकास ने जहां एक ओर अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, वहीं बहुत से गैरजि़म्मेदार उद्योगपतियों ने उद्योग लगाते समय प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली न विकसित करके पर्यावरण का बहुत नुकसान किया है। उद्योग और व्यवसाय में माल की ढुलाई के कारण ट्रकों से निकलने वाली गैसों से प्रदूषण फैलता है। गैरजि़म्मेदारी के पैमाने पर व्यक्तिगत रूप से भी हम लोग किसी से पीछे नहीं हैं। सुविधाजनक जीवन जीने के आदी हो चुके बहुत से लोगों के पास अपनी गाड़ियां हैं। होली-दीवाली के समय तो हम प्रदूषण फैलाते ही हैं, रोज़मर्रा की जि़दगी में भी गाड़ियों का अधिक से अधिक प्रयोग करके, हमने न केवल सड़कों पर भीड़ बढ़ाई है, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है। पर्यावरण के प्रदूषण का कारण है कि सूर्य की रोशनी ज़्यादा समय तक पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाती और शाम जल्दी ढल जाती है।
भारतीय मौसम विभाग तथा अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लीकेशन सेंटर) के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि तमाम तरह के प्रदूषण के कारण सूर्य की रोशनी के पृथ्वी तक सीधे पहुंचने का समय लगातार घटता जा रहा है जिसके कारण धूप और रोशनी का तीखापन प्रभावित हो रहा है जिससे दिन की लंबाई का समय घट जाता है। इससे शाम जल्दी ढलती है और हमें सूर्य की ऊर्जा का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, बल्कि इससे स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि सन् 1971 से सन् 2005 के बीच पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की सीधी रोशनी में गिरावट के कारण वर्ष भर की औसत दैनिक रोशनी का समय 8.4 घंटों से घट कर साढ़े सात घंटे रह गया है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, वाहनों और उद्योगों से होने वाले प्रदूषण, फसलों और सूखे पत्तों को खुले में जलाए जाने, बायोमास पदार्थों के जलने आदि से हवा में फैले कार्बन कणों के कारण कालिख बढ़ जाती है। यह कालिख सूर्य की रोशनी को जज्ब कर लेती है और उसकी आगे की यात्रा में व्यवधान पैदा करती है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता सहित सभी बड़े शहरों में पर्यावरण प्रदूषण की यह अवांछनीय बीमारी बढ़ रही है जो दिन की रोशनी के समय को प्रभावित करती है। शिलांग जैसे पर्वतीय स्थानों पर इसका असर कम है लेकिन महानगरों में दिन का समय घट चुका है और वैज्ञानिकों को आशंका है कि पिछले 40 वर्षों में दिन की रोशनी की औसत अवधि 10 प्रतिशत के आसपास घट गई है।
दिन की रोशनी को घटाने वाले प्रदूषणकारी तत्व मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं और इससे सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि कम रोशनी वाले दिनों की अपेक्षा तेज रोशनी वाले दिनों में हमारे मस्तिष्क से सेरोटोनिन नामक द्रव्य ज्यादा मात्रा में पैदा होता है जो हमारी मन:स्थिति (मूड) को खुशनुमा बनाता है। यदि धुंधलका लगातार बना रहे तो मन:स्थिति के विकार भी बढ़ सकते हैं।
पर्यावरण के प्रदूषित होने से हमें नुकसान हो रहा है, इसमें तो कोई शक है ही नहीं, अध्ययन सिर्फ यह बताएंगे कि यह नुकसान किस हद तक है और इससे हमारे स्वास्थ्य पर जो बुरा असर पड़ेगा उसके परिणाम क्या हो सकते हैं। मौसम और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिक एकमत हैं कि सूर्य की रोशनी के पृथ्वी पर आने का समय घटने से स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां आयेंगी। खेद की बात है कि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई भी जागरूकता अभियान नहीं चलाया जा रहा और न ही स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिया है जबकि यह अध्ययन पिछले 40-45 वर्षों से जारी है।
यह एक विडंबना ही है कि हम लोग सुविधासंपन्न जीवन के इस हद तक आदी हो चुके हैं कि अब हमें प्राकृतिक जीवन जीना असंभव लगने लगा है। आधुनिक जीवन शैली हमारे जीवन को आसान तो बना रही है पर यह उसे बीमार भी बना रही है। यह एक ऐसा अंतर्विरोध है जिसका तोड़ यही है कि कार्यालय जाने वाले लोग दोपहर के भोजन के अवकाश के समय सैर को निकलें और सूर्य की रोशनी से शरीर को ऊर्जा दें, शनिवार, रविवार तथा अवकाश वाले अन्य दिनों में खुले में ज्यादा समय बिताएं अथवा अपना दिन कुछ और पहले आरंभ करें और कार्यालय जाने से पहले खुले में योगाभ्यास करते हुए अथवा फुटबाल या बैडमिंटन जैसा कोई खेल खेलते हुए व्यायाम और सूर्य की ऊर्जा दोनों का सम्मिलित लाभ लें। हमें याद रखना चाहिए कि लंबे सुखमय जीवन के लिए सुविधा वांछनीय है परंतु स्वास्थ्य आवश्यक है। ***

P. K. Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

Alternative Journalism
वैकल्पिक पत्रकारिता

Please write to me at :
pkk@lifekingsize.com


जलाओ दिमाग की बत्ती




जलाओ दिमाग की बत्ती
                                                                                                                                l पी. के. खुराना
जनसामान्य में पीजीआई के नाम से प्रसिद्ध चंडीगढ़ स्थित चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के स्नातकोत्तर संस्थान 'पोस्टग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्चसे जुड़े तीन अलग-अलग अध्ययनों ने मेरे दिमाग की बत्ती जलाई है और मुझे उम्मीद है कि ये अध्ययन कुछ और लोगों के दिमाग की बत्ती भी जला सकते हैं।
मेरे मित्र और हास्य की दुनिया के बेताज बादशाह रहे स्वर्गीय जसपाल भट्टी ने अपने प्रसिद्ध कार्यक्रम उलटा-पुलटा के एक शो में आधुनिक जीवन की विकृति को चित्रित करते हुए बताया था कि आज के बच्चे खेल के नाम पर कंप्यूटर गेम्स या प्ले स्टेशन गेम्स में खोये रहते हैं और इस कारण शारीरिक गतिविधियों और व्यायाम से उनका नाता टूट गया है जिसके कारण उन्हें छोटी उम्र में ही स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं।
आज लगभग हर घर में केबल टेलिविज़न सुविधा उपलब्ध है, यानी सारा साल, हर रोज़, चौबीसों घंटे टीवी के किसी न किसी चैनल पर कोई न कोई मनोरंजक अथवा मनपसंद कार्यक्रम आ ही रहा होता है। हर कोई टीवी का दीवाना है। छोटे बच्चे कार्टून कार्यक्रमों में मस्त हो जाते हैं। मां-बाप इसे बड़ी सुविधा मानते हैं क्योंकि कार्टून शो में खोये बच्चे को कुछ भी और कितना भी खिलाना आसान होता है, बच्चा टीवी में व्यस्त हो जाता है और घर से बाहर नहीं जाता, शरारतें नहीं करता, फालतू की जि़द नहीं करता। संपन्न आधुनिक शहरी घरों में बच्चों के लिए प्ले स्टेशन पोर्टेबल (पीएसपी) भी उपलब्ध हैं और बच्चे इनमें खोये रहते हैं।
मां-बाप सोचते हैं कि बच्चा कार्टून ही तो देख रहा है, लेकिन वे उससे होने वाले दिमागी प्रभाव को नहीं समझ पाते। कार्टून शो में सीन बदलने की गति यानि फ्लिकरिंग इतनी तेज़ होती है कि कई बार बच्चे का दिमाग उसे पकड़ नहीं पाता और वह कन्फ्यूज़ हो जाता है। इससे बच्चे को उलटी होने जैसा महसूस हो सकता है। सीन बदलने के कारण रोशनी की तीव्रता तेजी से घटती-बढ़ती है, जिसे फ्लैशिंग कहते हैं। इससे भी बच्चों की आंखों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जिसे फोटोफोबिया कहा जाता है। लगातार कार्टून देखने वाले अथवा प्ले स्टेशन पर खेलने वाले बच्चे अक्सर इसीलिए बाद में थकान महसूस करते हैं और उन्हें मिरगी की शिकायत हो सकती है। पीजीआई में पीडियाट्रिक मेडिसिन की प्रोफेसर डा. प्रतिभा सिंघी तथा पीजीआई के ही स्कूल ऑव पब्लिक हेल्थ के डा. सोनू गोयल ने शहर के दो दर्जन से अधिक स्कूलों में हुए एक सर्वेक्षण के परिणामों की पुष्टि करते हुए बताया कि बच्चों द्वारा लंबे समय तक कार्टून देखना अथवा प्ले स्टेशन पर खेलना उनकी सेहत के लिए खतरनाक है।
अल्ज़ाइमर एक ऐसी बीमारी है जिससे ग्रस्त व्यक्ति रोज़मर्रा की साधारण चीजों को भी भूलने लगता है, मसलन, अलमारी खोलनी हो तो फ्रिज खोलकर खड़े हो जाएं, बात करते समय भूल जाएं कि बातचीत का विषय क्या था, अपनी कोई बात समझाने के लिए किसी विशिष्ट घटना का जिक्र शुरू कर दें और यह भूल जाएं कि उस उदाहरण से समझाना क्या चाहते थे, हाथ में पकड़ी या गोद में पड़ी किसी चीज को इधर-उधर ढूंढ़ें। 'डिमेंशियाÓ यानी दिमाग के तंतुओं के मरने के कारण होने वाली बीमारी अल्ज़ाइमर से बचने के लिए तथा स्मरण शक्ति के विकास के लिए आयुर्वेद ब्रह्मी बूटी के प्रयोग की सिफारिश करता है।
पीजीआई में न्यूरोलाजी विभाग के प्रोफेसर व मुखिया डा. सुदेश प्रभाकर के अनुसार चूहों पर किए प्रयोगों से डाक्टरों ने पाया है कि भूलने की बीमारी के इलाज के लिए ब्रह्मी बूटी सचमुच लाभदायक है और अब वह भूलने की बीमारी से ग्रस्त मरीजों पर ब्रह्मी बूटी के क्लीनिकल प्रयोग की तैयारी कर रहे हैं। इसके तहत डिमेंशिया से पीड़ित सौ मरीजों का चयन किया गया है। इनमें से 50 को परंपरागत एलोपैथी दवाएं दी जाएंगी और बाकी 50 को ब्रह्मी से बनी दवाएं। फर्क यह है कि ब्रह्मी से बनी दवाओं की गुणवत्ता और पैकिंग आदि का जिम्मा पीजीआई के ही फार्माकोलाजी विभाग को दिया गया है, जहां मान्य अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी ध्यान रखा जाएगा ताकि दवा के परिणाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश किए जा सकें। इस परियोजना की देखरेख कर रही टीम में पीजीआई के न्यूरोलाजी विभाग के डाक्टरों के अलावा एक आयुर्वेदाचार्य को भी शामिल किया गया है।
दिल्ली में रह रहीं डा. पूनम नायर ने चंडीगढ़ योग सभा के तत्वावधान में पीजीआई के साथ मिलकर विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को योगासनों से इलाज की पद्धति का अध्ययन किया ही, साथ ही उन्होंने पीजीआई में कार्यरत नर्सों को भी योगासन के माध्यम से अपने कार्य में दक्षता लाने की शिक्षा दी। यह अध्ययन चिंता, तनाव और उदासी से ग्रस्त मरीजों, उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) से ग्रस्त मरीजों और काम के दबाव से ग्रस्त नर्सों पर आधारित था। मरीजों को तीन समूहों में बांटा गया, पहले समूह को परंपरागत एलोपैथिक दवाइयां दी गईं, दूसरे समूह को यौगिक क्रियाओं, योगासनों, यौगिक प्राणायाम और योग मुद्राओं और काउंसलिंग की यौगिक चिकित्सा दी गई और तीसरे समूह को शवासन, प्राणायाम, खुशी और सफलता की स्थिति में स्वयं की कल्पना करने, अपने इष्ट भगवान के ध्यान आदि से यौगिक विश्राम से संबंधित क्रियाएं करवाई गईं।
डाक्टरों और नर्सों का जीवन बहुत कठिन होता है और लगातार रोगियों के संपर्क में रहने के कारण उनका अपना स्वास्थ्य हमेशा खतरे में रहता है। काम का दबाव उन्हें चिड़चिड़ा बना देता है और वे तनावग्रस्त हो सकते हैं। इसीलिए डा. पूनम नायर ने योग क्रियाओं का प्रयोग नर्सों पर भी किया। मरीजों और नर्सों पर यह प्रयोग कुछ वर्ष चला और इसके परिणाम आश्चर्यजनक रूप से उत्साहवर्धक रहे।
आज हमारा जीवन बहुत व्यस्त है और करिअर की दौड़ में सरपट भागते हुए हम सोच ही नहीं पा रहे कि हम जीवन में क्या खो रहे हैं। एकल परिवार में कामकाजी दंपत्ति के बच्चे अकेलापन महसूस करने पर टीवी और प्ले स्टेशन में व्यस्त होने की कोशिश करते हैं। भावनात्मक परेशानियों से जूझ रहा बच्चा एक बार इनका आदी हो जाए तो वह कई स्वास्थ्य समस्याओं का शिकार हो जाता है। किशोर अथवा युवा होते बच्चे भी व्यायाम के बजाए डिस्कोथेक के रेशमी अंधेरों, चौंधियाने वाली रोशनियों और तेज संगीत के शोर में गुम होते हुए सोच ही नहीं पाते कि उनका जीवन किन किस ओर बढ़ रहा है।
पीजीआई के उपरोक्त तीनों अध्ययनों का लब्बोलुबाब यह है कि योग और आयुर्वेद को एलोपैथी के शोध और गुणवत्ता के मानकों से जोड़ दिया जाए तो चिकित्सा विज्ञान विकसित होगा और रोगियों को लाभ होगा। इन अध्ययनों का एक और महत्वपूर्ण सबक यह भी है कि परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताएं और एक-दूसरे को भावनात्मक सहयोग दें। परिवार के सदस्यों का साथ और प्यार किसी भी बच्चे के लिए वरदान है जो उसे जीवन की कठिनाइयां झेलने के काबिल बनाता है और नशे और बीमारी की परेशानियों से बचाए रखता है। इस मंत्र की उपेक्षा करना आसान है पर उससे उत्पन्न होने वाली परेशानियों का सामना करना बहुत मुश्किल है। ***

P. K. Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

Alternative Journalism
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Sunday, September 16, 2012

गलत होता व्याकरण



गलत होता व्याकरण :: Galat Hota Vyaakaran

By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

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गलत होता व्याकरण
 पी. के. खुराना

हर भारतीय चाहता है कि भारतवर्ष उन्नति करे, एक विकसित देश बने और देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सारी सुविधाएं मौजूद हों। इसके लिए हमें गहन विचार की आवश्यकता है। गड़बड़ सिर्फ यह है कि हम सिर्फ विचार ही करते रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ते। भारत में हम चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सम्मेलन करते हैं, सेमिनार करते हैं खूब बातें करते हैं और इस तरह जताते हैं मानो किसी भी जनसुविधा का सुधार हमारा काम न हो, और नतीजतन बिलकुल भी कार्य नहीं करते हैं।

श्री सी. के. प्रह्लाद ने एक बार इन्फोसिस के चीफ मेंटर श्री नारायणमूर्ति से कहा था – ‘विकासशील देश होना महज एक मानसिकता है।’ श्री नारायणमूर्ति की तरह मैं भी इस कथन से सहमत हूं। श्री नारायणमूर्ति कहते हैं कि सत्तर के दशक में जब वे फ्रांस गए तो उन्होंने विकसित देश और विकासशील देश की मानसिकता का फर्क स्पष्ट देखा। फ्रांस में हर कोई इस तरह दिखाता है मानो जनसुविधाएं सुधारने पर चर्चा करना, बहस करना और उस दिशा में फटाफट काम करना उनका ही काम हो। भारत में हम इसके एकदम विपरीत काम करते हैं। हम या तो उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं या फिर सिर्फ चर्चा करते रह जाते हैं। हमारे यहां तो प्रधानमंत्री भी भाषण करते हैं तो वे कहते हैं – ‘गरीबी दूर होनी चाहिए!’ मानो, भारत की गरीबी दूर करना बराक ओबामा का काम हो!

आज हमारी मानसिकता गलत है, व्याकरण गलत है। ‘ऐसा होना चाहिए’, ‘वैसा होना चाहिए’ आदि को छोड़कर हमें अब ‘मैं करूंगा’ पर आने की ज़रूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि पुराना ज़माना पुराना था, वह बीत गया। अब ज़माना बदल गया है। नये दौर और नये ज़माने की ज़रूरतें नई होती हैं, समस्याएं नई होती हैं और नई समस्याओं के समाधान पुराने नहीं हो सकते।

अलग-अलग समय में अलग-अलग चीजों का महत्व होता है। कभी बड़ी जनसंख्या एक वरदान था क्योंकि उससे श्रमशक्ति बढ़ जाती थी, फिर एक ज़माना ऐसा आया जब ज़मीन और खेती संपदा के कारण बने। उसके बाद कारखाने और मिल बड़ी संपदा बन गए। आज के ज़माने में सूचना, ज्ञान और नेटवर्किंग संपदा हैं। पुराना ज़माना बीत जाए तो उसकी यादों से चिपके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। अपने अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को सुखद बनाना तो सार्थक है पर सुनहरे अतीत पर घमंड करना और वर्तमान की उपेक्षा करना हानिकारक है। समस्या यह है कि भारतवर्ष में सोने की चिडिय़ा के अतीत की कहानियां सुनना-सुनाना तो आम बात है पर वर्तमान का विश्लेषण करना और नये ज़माने की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को शिक्षित करना, योजना बनाना और कार्य संपन्न करना शायद दूसरी दुनिया के लोगों पर छोड़ दिया गया है।

हम सोने की चिडिय़ा थे। हमने शून्य का आविष्कार किया, गिनती उसी से बनी। पुरातन काल में हमारा विज्ञान उन्नत था। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि पांच हज़ार वर्ष पूर्व भी हमारे यहां विमान थे। ऐसा माना जाता है कि रावण के पास पुष्पक विमान था और वह दूर की यात्राएं वायुमार्ग से करता था। हमारी युद्ध कला बहुत उन्नत थी, हमारे योद्धाओं के पास अग्निबाण जैसे आग बरसाने वाले या पानी बरसाने वाले या नागपाश की तरह बांध लेने वाले अस्त्र-शस्त्र थे। हमारी चिकित्सा पद्धति भी बहुत उन्नत थी। हमारे वैज्ञानिक, भूगोलविद्, खगोलविद् आदि विद्वानों ने संसार को ज्ञान और आविष्कारों का एक बड़ा खज़ाना दिया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। हमें अपनी विरासत पर गर्व होना ही चाहिए। इसमें कुछ भी गलत अथवा अस्वाभाविक नहीं है। पर क्या इतना ही काफी है?

श्री नारायणमूर्ति उन गिने-चुने भारतीयों में से एक हैं जो पूर्ण पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। खुद उनका जीवन एक खुली किताब है। वे एक अच्छे इन्सान ही नहीं, एक आदर्श देशभक्त भी हैं और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे वे न करते हों, या जिसे करने में वे विश्वास न करते हों। श्री नारायणमूर्ति ने अनेक बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, दक्षिणपंथियों, मध्यमार्गियों, वामपंथियों से बात की, अध्ययन किया, निरीक्षण किया, डाटा इकट्ठा किया और दुनिया में गरीबी मिटाने और आर्थिक विकास के मूलभूत उपायों का विश्लेषण करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले। उनका निष्कर्ष था कि गरीबी की समस्या का एकमात्र समाधान अच्छी आय वाली नौकरियों के अवसर पैदा करना है। इसके लिए ऐसे उद्यमी चाहिएं जो धारणाओं को अवसर और धन में बदल सकें। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और तथाकथित बिजनेस स्कूल भी विद्यार्थियों को नौकरी के लिए या अच्छे वेतन वाली नौकरी के लिए तो तैयार करते हैं पर वे उन्हें उद्यमी नहीं बनाते। ज्यादातर शिक्षित व्यक्ति क्लर्क, अफसर, मैनेजर या चीफ मैनेजर बनने का सपना देखते हैं, उद्यमी बनने का नहीं। नौकरीपेशा व्यक्ति को सिर्फ स्वयं को रोजगार मिलता है जबकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई अन्य लोगों के रोज़गार का भी कारण बनता है। गरीबी दूर करने का यह रामबाण उपाय है।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि विकास गरीबों की कीमत पर नहीं हो सकता। हमें सहृदय पूंजीवाद और इन्क्लूसिव डेवेलपमेंट को अपनाना होगा। ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिएं जो आम लोग खरीद सकें। इसके साथ ही गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाने के ठोस उपाय भी किये जाएं। रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के अलावा उत्पादन और वितरण का ऐसा माडल तैयार करना होगा जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े और सामान भी सस्ते हों। यह नयी सामाजिक व्यवस्था, दृष्टिकोण में परिवर्तन तथा सोशल इन्नोवेशन से संभव है। आम आदमी, सामाजिक संगठन और कारपोरेट घराने ऐसा कर सकते हैं।

जब मैं सामाजिक व्यवस्था की बात करता हूं तो मेरी कल्पना में राजा अग्रसेन आते हैं जिनके राज्य में यह नियम था कि यदि वहां कोई बाहरी व्यक्ति आये तो राज्य का हर व्यक्ति उसे एक रुपया और एक ईंट भेंट स्वरूप देता था ताकि उन ईंटों से वह अपना घर बना सके और उन रुपयों से अपना व्यवसाय जमा सके। यह एक सामाजिक व्यवस्था थी जहां हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति की सफलता के लिए योगदान देता था। इसी तरह सहृदय पूंजीवाद के माध्यम से वंचितों के विकास के लिए साधन बनाने होंगे। सहृदय पूंजीवाद में लाभ के धन का एक भाग समाज और देश के विकास में लगता है। यह तभी संभव है जब हम ‘चाहिए’ का व्याकरण छोड़कर ‘मैं करूंगा’ का व्याकरण अपना लें, तभी हम उन्नति कर सकेंगे और एक विकसित देश बन सकेंगे। 



सोशल मीडिया का नया युग




सोशल मीडिया का नया युग
          -- पी. के. खुराना

The Dawn of a New Era in Social Media
By : PK Khurana

(pkk@lifekingsize.com)

कंप्यूटर का आविष्कार एक चमत्कार था, इंटरनेट एक और चमत्कार था और इसके बाद सोशल मीडिया भी एक चमत्कार था। एक और वेबसाइट टॉक2सेलेब्स.कॉ(talk2celebs.com) ने सोशल मीडिया में एक नये युग की शुरुआत की है। इसे ज़रा विस्तार से समझने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया के इस ज़माने में हम ब्लॉग, फेसबुक, आर्कुट, नेटलॉग, ट्विटर आदि सोशल मीडिया साइटों के ज़रिये हम दुनिया भर से जुड़ गए हैं और हमारे मित्रों की संख्या हज़ारों में भी हो सकती है। सूचनाओं के प्रसार की गति अविश्वसनीय रूप से तेज़ हो गई है और सोशल मीडिया जनमत बनाने या जनमत को प्रभावित करने का एक उपयोगी और कारगर हथियार बन कर उभरा है। इंटरनेट और ईमेल ने हमारे जीवन के ढंग में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया था पर सोशल मीडिया ने तो एक कदम आगे जाकर सारी दुनिया को हमारी दहलीज पर ला दिया है। सोशल मीडिया ने कई सार्थक बहसों को जन्म दिया है और कई सामाजिक अभियानों को मजबूती प्रदान की है। हम सोशल मीडिया से जुड़े हों या न, हम सोशल मीडिया के पक्ष में हों या विरोध में, पर यह अब हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है और हम इससे बच नहीं सकते।

इंटरनेट, सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की त्रिवेणी ने अब एक ऐसी शक्तिपीठ की रचना की है कि उसके सामने पारंपरिक मीडिया का तेज फीका पड़ गया है। प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध एवं विशिष्ट व्यक्तियों के लिए ट्विटर को अपनाना इसलिए आसान था क्योंकि यहां केवल 140 अक्षरों में ही अपनी बात समाप्त कर देने की स्वतंत्रता है, जो कहीं और संभव नहीं थी। सोशल नेटवर्किंग साइटों पर, बिना किसी खर्च के, मित्रों और प्रशंसकों के माध्यम से सेकेंडों में करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की सुविधा ने इसे एकदम से ग्राह्य बना दिया।

एक तरफ सोशल मीडिया ने प्रसिद्ध लोगों को अपने प्रशंसकों से जुड़ने का अवसर दिया तो दूसरी तरफ प्रशंसकों और सामान्य जन को भी प्रसिद्ध लोगों के मन में झांकने और उनके विचार जानने का मौका मिला। स्टार और सेलेब्रिटी माने जाने वाले विशिष्ट व्यक्ति पहले तो वेबसाइट और ब्लॉग के माध्यम से लोगों से जुड़े, परंतु वहां पहुंच सीमित थी क्योंकि जो व्यक्ति आपकी वेबसाइट पर नहीं आया, उसे आपके बारे में जानने का मौका नहीं मिलता था। फिर आर्कुट और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों ने तो जैसे धूम ही मचा दी। फेसबुक के साथ ही यूट्यूब, फ्लिकर और ट्विटर की लोकप्रियता भी बढ़ती चली गई और सोशल मीडिया साइटें हमारी जीवन का अभिन्न अंग बन गईं। हाल ही में पिंटेरेस्ट की चर्चा भी बढ़ी है, हालांकि अभी उसे सेलेब्रिटी स्टेटस नहीं मिला है। सोशल मीडिया साइटों में ट्विटर की अपनी अलग पहचान बन गई है क्योंकि व्यस्त लोगों के लिए भी अपने स्मार्टफोन से ही सिर्फ 140 अक्षरों में अपनी बात ट्वीट कर देने के लिए समय निकालना कठिन नहीं है और कई सेलेब्रिटीज़ तो दिनमें कई-कई बार ट्वीट करते हैं। अब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज लगभग सभी विशिष्टजन ट्वीट की भाषा में बोलते हैं, और उनके करोड़ों-करोड़ों प्रशसंक पूरी निष्ठा से उनके ट्वीट पढ़ते हैं, उस पर चर्चा करते हैं, टिप्पणी करते हैं, टिप्पणियों पर टिप्पणी करते हैं। अपने मनपसंद सेलेब्रिटी से दोतरफा संवाद का ऐसा और कोई माध्यम नहीं है।

अमरीकी गायिका लेडी गागा के ट्विटर एकाउंट पर प्रशंसकों की संख्या 2,78,48,540 है जो सऊदी अरेबिया, आस्ट्रेलिया और ग्रीस की सम्मिलित आबादी से भी ज़्यादा है। कनाडा की पॉप संगीतकार जस्टीन बीबर के ट्विटर एकाउंट पर प्रशंसकों की संख्या 2,59,33,400 है। अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ट्विटर पर सर्वाधिक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ हैं और उनके प्रशंसकों की संख्या 1,80,99,382 है जबकि फुटबाल खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के ट्विटर एकाउंट पर उनके प्रशंसकों की संख्या 1,20,73,467 है। भारतवर्ष में लोककथाओं के नायकों की मानिंद प्रसिद्ध अमिताभ बच्चन के हर ट्वीट को पढ़ने के लिए 31,78,881 लोगों का बड़ा समूह हमेशा बेताब दिखता है। अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और बालीवुड के बादशाह शाहरुख खान के ऑनलाइन प्रशंसकों की संख्या भी बहुत से नामी-गिरामी अखबारों से बहुत-बहुत ज्यादा है।

जैसे-जैसे मध्यवर्ग का विस्तार हो रहा है, मोबाइल फोन धारकों की संख्या बढ़ती जा रही है। मोबाइल फोन सस्ते होते जा रहे हैं और स्मार्टफोन अब एक आम चीज़ हैं। अब तो बहुत से 3-जी कंपैटिबल फोन भी इतने सस्ते हैं कि हर कोई उन्हें खरीद सकता है। इसके कारण भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है। सोशल मीडिया के इस उपभोग का ही परिणाम है कि अब प्रसिद्ध व्यक्तियों के ऑनलाइन प्रशंसकों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि ये सेलेब्रिटी हस्तियां स्वयं एक माध्यम बनकर खुद भी 'मीडिया' की श्रेणी में आ गए हैं।

बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सदैव नई सुविधाओं, सेवाओं और उत्पादों की आवश्यकता रही है और विश्व में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं रही जो नई आवश्यकताओं को समझ कर नई सुविधा, नई सेवा या नए उत्पाद प्रस्तुत करते रहे हैं और उसे दुनिया ने हाथों-हाथ लिया है। इसी तरह की एक वेबसाइट टॉक2सेलेब्स.कॉम है। इस वेबसाइट की खासियत यह है कि इसमें दुनिया भर के सेलेब्रिटीज़ के फेसबुक, ट्विटर, नेटलॉग, आर्कुट व यूट्यूब आदि लिंक शामिल हैं जहां आप किसी भी सेलेब्रिटी के सोशल मीडिया साइट पर उनसे चैट कर सकते हैं, कमेंट कर सकते हैं, कमेंट पर कमेंट कर सकते हैं और उसे अपने मित्रों के साथ शेयर कर सकते हैं। टॉक2सेलेब्स.कॉम के साथ सोशल मीडिया का एक और नया युग (The Dawn of a New Era in Social Media) शुरू हुआ है। सेलेब्रिटीज़ के विचारों और कामों से समाज प्रभावित होता है, प्रेरित होता है। टॉक2सेलेब्स.कॉम ने पहली बार सभी सेलेब्रिटीज़ को एक ही मंच पर ला दिया है। यही नहीं इसमें हॉलीवुड, बॉलीवुड, राजनीति, व्यवसाय, पत्रकारिता, कला, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों के विशिष्ट जनों का समावेश है।

सोशल मीडिया की खासियत यह है कि इसके माध्यम से आप समाचार पा सकते हैं और समाचार दे सकते हैं। यह दो-तरफा संवाद है जहां आपको दुनिया भर की खबरें मिलती हैं और आप दुनिया भर को अपनी खबर दे सकते हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि सोशल मीडिया ऐसा अखबार है जिसे खरीदना नहीं पड़ता और जिसके प्रकाशन पर भी आपको कोई खर्च नहीं करना पड़ता। इसके अलावा सोशल मीडिया के माध्यम से आप दुनिया के हर कोने से एक साथ जुड़ जाते हैं। सोशल मीडिया की इसी खूबी ने इसे इतना खास बना दिया है कि सारी दुनिया सोशल मीडिया में सिमट गई है। इसी कड़ी में टॉक2सेलेब्स.कॉम ने एक नये युग की शुरुआत तो की है, पर क्या यह किसी अगले चमत्कार की वजह भी बन पायेगा? यह देखना अभी बाकी है कि इस कड़ी का अगला चमत्कार क्या होगा। ***

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Sunday, February 19, 2012

गलत होता व्याकरण




गलत होता व्याकरण :: Galat Hota Vyaakaran

By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना


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pkk@lifekingsize.com



गलत होता व्याकरण
 पी. के. खुराना


हर भारतीय चाहता है कि भारतवर्ष उन्नति करे, एक विकसित देश बने और देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सारी सुविधाएं मौजूद हों। इसके लिए हमें गहन विचार की आवश्यकता है। गड़बड़ सिर्फ यह है कि हम सिर्फ विचार ही करते रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ते। भारत में हम चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सम्मेलन करते हैं, सेमिनार करते हैं खूब बातें करते हैं और इस तरह जताते हैं मानो किसी भी जनसुविधा का सुधार हमारा काम न हो, और नतीजतन बिलकुल भी कार्य नहीं करते हैं।

श्री सी. के. प्रह्लाद ने एक बार इन्फोसिस के चीफ मेंटर श्री नारायणमूर्ति से कहा था – ‘विकासशील देश होना महज एक मानसिकता है।’ श्री नारायणमूर्ति की तरह मैं भी इस कथन से सहमत हूं। श्री नारायणमूर्ति कहते हैं कि सत्तर के दशक में जब वे फ्रांस गए तो उन्होंने विकसित देश और विकासशील देश की मानसिकता का फर्क स्पष्ट देखा। फ्रांस में हर कोई इस तरह दिखाता है मानो जनसुविधाएं सुधारने पर चर्चा करना, बहस करना और उस दिशा में फटाफट काम करना उनका ही काम हो। भारत में हम इसके एकदम विपरीत काम करते हैं। हम या तो उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं या फिर सिर्फ चर्चा करते रह जाते हैं। हमारे यहां तो प्रधानमंत्री भी भाषण करते हैं तो वे कहते हैं – ‘गरीबी दूर होनी चाहिए!’ मानो, भारत की गरीबी दूर करना बराक ओबामा का काम हो!

आज हमारी मानसिकता गलत है, व्याकरण गलत है। ‘ऐसा होना चाहिए’, ‘वैसा होना चाहिए’ आदि को छोड़कर हमें अब ‘मैं करूंगा’ पर आने की ज़रूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि पुराना ज़माना पुराना था, वह बीत गया। अब ज़माना बदल गया है। नये दौर और नये ज़माने की ज़रूरतें नई होती हैं, समस्याएं नई होती हैं और नई समस्याओं के समाधान पुराने नहीं हो सकते।

अलग-अलग समय में अलग-अलग चीजों का महत्व होता है। कभी बड़ी जनसंख्या एक वरदान था क्योंकि उससे श्रमशक्ति बढ़ जाती थी, फिर एक ज़माना ऐसा आया जब ज़मीन और खेती संपदा के कारण बने। उसके बाद कारखाने और मिल बड़ी संपदा बन गए। आज के ज़माने में सूचना, ज्ञान और नेटवर्किंग संपदा हैं। पुराना ज़माना बीत जाए तो उसकी यादों से चिपके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। अपने अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को सुखद बनाना तो सार्थक है पर सुनहरे अतीत पर घमंड करना और वर्तमान की उपेक्षा करना हानिकारक है। समस्या यह है कि भारतवर्ष में सोने की चिडिय़ा के अतीत की कहानियां सुनना-सुनाना तो आम बात है पर वर्तमान का विश्लेषण करना और नये ज़माने की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को शिक्षित करना, योजना बनाना और कार्य संपन्न करना शायद दूसरी दुनिया के लोगों पर छोड़ दिया गया है।

हम सोने की चिडिय़ा थे। हमने शून्य का आविष्कार किया, गिनती उसी से बनी। पुरातन काल में हमारा विज्ञान उन्नत था। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि पांच हज़ार वर्ष पूर्व भी हमारे यहां विमान थे। ऐसा माना जाता है कि रावण के पास पुष्पक विमान था और वह दूर की यात्राएं वायुमार्ग से करता था। हमारी युद्ध कला बहुत उन्नत थी, हमारे योद्धाओं के पास अग्निबाण जैसे आग बरसाने वाले या पानी बरसाने वाले या नागपाश की तरह बांध लेने वाले अस्त्र-शस्त्र थे। हमारी चिकित्सा पद्धति भी बहुत उन्नत थी। हमारे वैज्ञानिक, भूगोलविद्, खगोलविद् आदि विद्वानों ने संसार को ज्ञान और आविष्कारों का एक बड़ा खज़ाना दिया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। हमें अपनी विरासत पर गर्व होना ही चाहिए। इसमें कुछ भी गलत अथवा अस्वाभाविक नहीं है। पर क्या इतना ही काफी है?

श्री नारायणमूर्ति उन गिने-चुने भारतीयों में से एक हैं जो पूर्ण पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। खुद उनका जीवन एक खुली किताब है। वे एक अच्छे इन्सान ही नहीं, एक आदर्श देशभक्त भी हैं और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे वे न करते हों, या जिसे करने में वे विश्वास न करते हों। श्री नारायणमूर्ति ने अनेक बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, दक्षिणपंथियों, मध्यमार्गियों, वामपंथियों से बात की, अध्ययन किया, निरीक्षण किया, डाटा इकट्ठा किया और दुनिया में गरीबी मिटाने और आर्थिक विकास के मूलभूत उपायों का विश्लेषण करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले। उनका निष्कर्ष था कि गरीबी की समस्या का एकमात्र समाधान अच्छी आय वाली नौकरियों के अवसर पैदा करना है। इसके लिए ऐसे उद्यमी चाहिएं जो धारणाओं को अवसर और धन में बदल सकें। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और तथाकथित बिजनेस स्कूल भी विद्यार्थियों को नौकरी के लिए या अच्छे वेतन वाली नौकरी के लिए तो तैयार करते हैं पर वे उन्हें उद्यमी नहीं बनाते। ज्यादातर शिक्षित व्यक्ति क्लर्क, अफसर, मैनेजर या चीफ मैनेजर बनने का सपना देखते हैं, उद्यमी बनने का नहीं। नौकरीपेशा व्यक्ति को सिर्फ स्वयं को रोजगार मिलता है जबकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई अन्य लोगों के रोज़गार का भी कारण बनता है। गरीबी दूर करने का यह रामबाण उपाय है।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि विकास गरीबों की कीमत पर नहीं हो सकता। हमें सहृदय पूंजीवाद और इन्क्लूसिव डेवेलपमेंट को अपनाना होगा। ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिएं जो आम लोग खरीद सकें। इसके साथ ही गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाने के ठोस उपाय भी किये जाएं। रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के अलावा उत्पादन और वितरण का ऐसा माडल तैयार करना होगा जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े और सामान भी सस्ते हों। यह नयी सामाजिक व्यवस्था, दृष्टिकोण में परिवर्तन तथा सोशल इन्नोवेशन से संभव है। आम आदमी, सामाजिक संगठन और कारपोरेट घराने ऐसा कर सकते हैं।

जब मैं सामाजिक व्यवस्था की बात करता हूं तो मेरी कल्पना में राजा अग्रसेन आते हैं जिनके राज्य में यह नियम था कि यदि वहां कोई बाहरी व्यक्ति आये तो राज्य का हर व्यक्ति उसे एक रुपया और एक ईंट भेंट स्वरूप देता था ताकि उन ईंटों से वह अपना घर बना सके और उन रुपयों से अपना व्यवसाय जमा सके। यह एक सामाजिक व्यवस्था थी जहां हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति की सफलता के लिए योगदान देता था। इसी तरह सहृदय पूंजीवाद के माध्यम से वंचितों के विकास के लिए साधन बनाने होंगे। सहृदय पूंजीवाद में लाभ के धन का एक भाग समाज और देश के विकास में लगता है। यह तभी संभव है जब हम ‘चाहिए’ का व्याकरण छोड़कर ‘मैं करूंगा’ का व्याकरण अपना लें, तभी हम उन्नति कर सकेंगे और एक विकसित देश बन सकेंगे। 

Population : Boon or Bane / जनसंख्या : समस्या अथवा वरदान




Population : Boon or Bane
जनसंख्या : समस्या अथवा वरदान


By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

Please write to me at :
pkk@lifekingsize.com


जनसंख्या : समस्या अथवा वरदान -- पी. के. खुराना

जनसंख्या के लिहाज़ से भारतवर्ष विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। आबादी के आकार की बात करें तो हमारा देश अमरीका, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, पाकिस्तान, बांग्लादेश और जापान की सम्मिलित आबादी के बराबर है और पिछले 10 वर्षों में हमारे देश की जनसंख्या में एक पूरे देश ब्राज़ील की जनसंख्या और जुड़ गई है। जनसंख्या बढऩे का मतलब है कि हमें ज्यादा लोगों के शिक्षा के साधन, रोज़गार, खाना और रहने के लिए मकान चाहिएं। हमारे देश में बहुत सी समस्याएं हैं, जनसंख्या की समस्या उनमें से बहुतों का मूल है, पर यह भी सच है कि ज्यादा आबादी के कारण आज हम लाभ की स्थिति में भी हैं।

भारतवर्ष में 15 वर्ष से 59 वर्ष के लोगों की वृद्धि का अनुपात आबादी की वृद्धि के अनुपात से अधिक है और यह स्थिति 2030 तक बने रहने की उम्मीद है। यह वह आबादी है जो काम में लगी है अथवा काम में लगाई जा सकती है। ऐसी जनसंख्या वाला भारत एकमात्र विकासशील देश है।

आज हमारे सामने सवाल यह है कि जनसंख्या के इस वर्ग को काम में लगाकर हम इसे अपने लिए वरदान बना लेंगे या फिर राजनेताओं की थोथी बयानबाज़ी और अपनी खुद की लापरवाही, अकर्मण्यता तथा अज्ञान के कारण बढ़ती आबादी को अपने लिए अभिशाप बना लेंगे तथा वर्तमान से भी ज्य़ादा गरीबी तथा साधनहीनता की स्थिति में पहुंच जाएंगे। हमारे सामने यह एक बड़ी चुनौती है, और यही एक बड़ा अवसर भी है।

फ्रेंच पोलिटिकल सांइटिस्ट क्रिस्टोफर जैफरेलो दक्षिण-पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ हैं और भारत-पाकिस्तान पर उनकी खास पकड़ है। उनकी संपादित पुस्तक ‘इंडिया सिंस 1950 : सोसाइटी, पॉलिटिक्स, इकोनामी एंड कल्चर’ में भारत का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विश्लेषण किया गया है। इसी पुस्तक के अध्याय ‘इंडिया 2025’ के अनुसार भारतवर्ष उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक संभावनाओं वाला देश है। यहां न सिर्फ राजनीतिक स्थिरता है बल्कि यहां लोकतंत्र के साथ बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था भी है। हालांकि भारत की विकास दर यदा-कदा ही दोहरे अंक तक पहुंच सकी है लेकिन पिछले दस वर्षों से यह 7-8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। जीडीपी के लिहाज से 2025 तक हमारा देश अमरीका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा देश बन जाएगा। बचत और निवेश की अच्छी दर का भी भारत को लाभ मिलेगा और सन् 2020 तक देश की उत्पादकता भी बढ़ती रहने के संकेत हैं।

विद्वानों का मानना है कि उत्पादकता बढऩे के पांच मुख्य कारण हैं। एक, अर्थव्यवस्था में कृषि की जगह उद्योग और सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी; दो, विश्व अर्थव्यवस्था में भारतीय कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी; तीन, बैंकिंग सेक्टर का आधुनिकीकरण; चार, आईटी टूल्स का बढ़ता इस्तेमाल; और पांच, संचार व परिवहन के साधनों का विकास।

क्या भारतीय अर्थव्यवस्था इसी रफ्तार से आगे बढ़ सकती है? अगर हां, तो आने वाले वर्षों में इसके क्या समाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे? एक चुनौती तो स्पष्ट रूप से बढ़ती असमानता है। यह असमानता सिर्फ सामाजिक स्तर पर नहीं, बल्कि भौगोलिक स्तर पर भी है। ग्रामीण भारत आगे नहीं बढ़ रहा है। इससे ग्रामवासियों में शहरी मध्यवर्ग के मुकाबले गहरी हताशा पैठ सकती है और यह असंतोष माओवादियों अथवा ऐसे ही अन्य संगठनों के पक्ष में जा सकता है। हमारी चुनौती यह है कि आबादी को हम बोझ न बनने दें बल्कि उसे परिसंपत्ति में परिवर्तित कर दें।

माना जाता है कि भारत की आबादी इक्कीसवीं सदी के मध्य तक चीन को पार कर डेढ़ अरब हो जाएगी। साल 2025 तक कामकाजी वर्ग की आबादी मे 25 करोड़ लोगों का इज़ाफा होगा। इसका अर्थ है कि भारत अन्य देशों के मुकाबले में युवा रहेगा और शायद वेतन भी कम रखने की स्थिति में होगा। इस वर्ग को परिसंपत्ति बनाने के लिए हमें शिक्षा सुविधाओं का तेज विकास करना होगा और नए रोजगार पैदा करने होंगे। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा ऐसी हो जिससे कृषक वर्ग भी लाभान्वित हो सके। आबादी में हर साल एक करोड़ सत्तर लाख लोगों के जुडऩे का मतलब है कि खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनने के लिए हमें कृषि उत्पादन में सालाना 4 से 4.5 प्रतिशत तक की वृद्धि सुनिश्चित करनी होगी। उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में पिछले दस वर्षों में कृषि उत्पादन गिरा है। राष्ट्रीय स्तर पर गेहूं और चावल का उत्पादन स्थिर हो गया है। इससे प्रति व्यक्ति अनाज और दालों की उपलब्धता घटी है। इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता है।

कमज़ोर इन्फ्रास्ट्रक्चर एक अहम अड़चन है। सड़कों और रेलों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। ऊर्जा की स्थिति और भी संकटपूर्ण है। कोयले और तेल की बढ़ती खपत का संकट अलग से है। परिणामस्वरूप बिजली की कटौती जारी रहने की आशंका है। ऐसे में बढ़ती आबादी का बड़ा हिस्सा बेरोज़गार, अर्धशिक्षित अथवा अशिक्षित तथा साधनहीन होगा। इस स्थिति को न बदला गया तो बढ़ती आबादी सचमुच अभिशाप बन जाएगी। स्थिति को बदलने के लिए सबसे पहले कस्बों और गांवों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के तेज विकास के लिए काम करना होगा, उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवानी होंगी तथा उन्हें रोज़गारपरक उद्यमिता की शिक्षा देनी होगी। कंज्य़ूमर गुड्स कंपनियों को आज ग्रामीण भारत में बड़ा बाज़ार नज़र आ रहा है। इस बाज़ार को बढ़ाने के लिए यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में योगदान उनके अपने हित में है। विभिन्न सरकारें भी इस ओर ध्यान दें तो समाज में असमानता नहीं होगी तथा सामाजिक विघटन का खतरा नहीं रहेगा। हमारी अधिकांश आबादी कामकाजी होगी तो गरीबी मिटेगी, देश समृद्ध होगा और उसके कारण भी इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा। यह एक ऐसा सार्थक चक्र होगा जो देश को विकास की नई दिशा देगा और हमें विकसित देश बनने में मददगार साबित होगा।

अगर हमने ऐसा न किया तो यह आबादी अभिशाप बन जाएगी, स्लग एरिया बढ़ेगा, चोरियां, हत्याएं और सभी तरह के अपराध बढ़ेंगे, गांवों को विकास नहीं होगा और शहरों का जीवन असुरक्षित हो जाएगा। हमें याद रखना चाहिए कि गरीबी और विकास के बीच चुनाव हमें करना है, परिणाम भी हम ही भुगतेंगे। 

Alternative Journalism, Alternative Journalism in India, Pioneering Alternative Journalism, Pioneering Alternative Journalism in India, Pioneering Alternative Journalism in India : PK Khurana, Alternative Journalism and PK Khurana, भारत में वैकल्पिक पत्रकारिता, वैकल्पिक पत्रकारिता, भारत में वैकल्पिक पत्रकारिता के जनक, वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रवर्तक, भारतवर्ष में वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रवर्तक, भारतवर्ष में वैकल्पिक पत्रकारिता के प्रवर्तक पी. के. खुराना

Subsidies Cannot Eliminate Poverty :: गरीबी नहीं हटा सकती कोई 'खैरात'!




Subsidies Cannot Eliminate Poverty :: गरीबी नहीं हटा सकती कोई 'खैरात'!


By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

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गरीबी नहीं हटा सकती कोई 'खैरात'!
 पी. के. खुराना

धारणा के स्तर पर हमारा देश एक लोककल्याणकारी राज्य, एक 'वेलफेयर स्टेट' है। धारणा के स्तर पर हम पूंजीवादी नहीं हैं। यह सही भी है क्योंकि किसी आम आदमी के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि प्रगति के सारे सोपानों के बावजूद 35 करोड़ से भी अधिक भारतीय अशिक्षित हैं, 32 करोड़ भारतीय पीने के साफ पानी से वंचित हैं और 25 करोड़ देशवासियों को सामान्य चिकित्सा उपलब्ध नहीं है और देश के 51 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। ऐसे में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ही सही प्रतीत होती है।

सन् 1956 में भारत सरकार ने एक योजना बनाई थी जिसके अनुसार अगले 25 वर्षों में भारत को गरीबी मुक्त राष्ट्र बनना था। सन् 1981 में वे 25 साल पूरे हो गए, पर सपना अब भी अधूरा है जबकि 1981 के बाद 30 और साल गुज़र चुके हैं। इस समय हमारी सबसे बड़ी समस्या है सर्वाधिक गरीबी का जीवन जी रहे वंचितों के लिए भोजन की व्यवस्था करना, उससे ऊपर के लोगों के जीवन के स्तर में सुधार लाने के लिए स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना और किफायती शिक्षा की व्यवस्था करना तथा शेष समाज की आवश्यकताओं के लिए कृषि में नई तकनीकों का लाभ लेना, भूमि अधिग्रहण कानून को सभी संबंधित पक्षों के लिए लाभदायक बनाना तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उद्योगों का विस्तार करना।

गरीबी दूर करने के नाम पर हमारे देश में आरक्षण और सब्सिडी का जो नाटक चल रहा है उसने देश और समाज का बहुत नुकसान किया है। हमारे नेता सब्सिडी के नाम पर खूब धोखाधड़ी कर रहे हैं। डीज़ल और पेट्रोल पर इतना टैक्स है कि यदि वह टैक्स हटा लिया जाए तो किसी सब्सिडी की आवश्यकता ही न रहे। सब्सिडी देने के बाद टैक्स लगाकर सरकार एक हाथ से देती है तो दूसरे से तुरंत वापिस भी ले लेती है। दूसरी ओर, आज हर कोई आरक्षण के लिए लड़ रहा है और अगड़े अथवा शक्तिसंपन्न लोग भी आरक्षण पाने के लिए आंदोलन करने लगे हैं। यह विडंबना ही है कि दुनिया भर में भारत में आरक्षण का प्रतिशत सर्वोच्च है और हमारा देश एकमात्र ऐसा देश बन गया है जहां लोग पिछड़ा कहलाने के लिए आंदोलन करते हैं। परिणामस्वरूप, आज लोग मेहनत, ज्ञान और ईमानदारी की तुलना में पिछड़ेपन को उन्नति का साधन मानते हैं। सच्चाई यह है कि सब्सिडी की तरह ही आरक्षण भी एक धोखा मात्र है। सरकार के पास नई नौकरियां नहीं हैं, जो हैं वे भी खत्म हो रही हैं। आरक्षण से समाज का भला होने के बजाए समाज में विरोध फैला है, दलितों और वंचितों को रोज़गार के काबिल बनने की शिक्षा देने के बजाए उन्हें बैसाखियों का आदी बनाया जा रहा है। आरक्षण का लाभ केवल कुछ परिवारों तक सीमित होकर रह गया है। गरीब मजदूर का बच्चा तो गरीबी के कारण अशिक्षित रह जाता है और अशिक्षा के कारण सरकारी नौकरी में आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाता है। वह मजदूर पैदा होता है, और मजदूर रहते हुए ही जीवन बिता देता है।

अभी पिछले सप्ताह ही वरिष्ठ पत्रकार श्री टी एन नाइनन ने अपने एक लेख में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से पैदा हुई इस स्थिति का विस्तार से जायज़ा लिया है। उन्होंने उदाहरण दिया है कि दिल्ली में पेट्रेाल की कीमत 65 रुपये प्रति लीटर है, डीज़ल 41 प्रति लीटर में बिकता है जबकि इस वर्ग में उच्चतम सब्सिडी के कारण मिट्टी के तेल की कीमत 17 रुपये प्रति लीटर है। परिणाम यह है कि दिल्ली में बिकने वाले कुल पेट्रोल में कम से कम आधे पेट्रोल में मिट्टी के तेल की मिलावट होती है। इतने बड़े स्तर पर मिलावट का यह खेल सिर्फ इसलिए चल पाता है क्योंकि इस खेल में राजनेता, अधिकारी, पुलिस और व्यापारियों का साझा गिरोह है जो गरीबों की सब्सिडी को लूट ले जाता है और गरीबों के नाम पर मिली यह खैरात अमीरों में बंट जाती है।

अमीरों से पैसा छीनकर गरीबों में बांटने की अवधारणा इस हद तक विकृत हुई कि स्व. इंदिरा गांधी के ज़माने में आयकर की दर 97 प्रतिशत तक जा पहुंची। सत्तानवे प्रतिशत! यानी, अगर आप मेहनत करके सौ रुपये कमाएं तो सत्तानवे रुपये सरकार छीन लेती थी और आपके पास बचते थे तीन रुपये! क्या आप नहीं समझ सकते कि टैक्स की इस अतर्कसंगत प्रथा ने ही देश में काले धन की अर्थव्यवस्था का सूत्रपात किया और आज शायद पक्ष और विपक्ष का एक भी राजनीतिज्ञ, सरकार का एक भी बड़ा अधिकारी और बड़े व्यापारियों में से एक भी ऐसा नहीं है जिसके पास काला धन न हो। ऐसे में किसी एक व्यक्ति को दोष देना पेड़ की पत्तियों को दोष देने के समान है जबकि बुराई जड़ों में है। किसानों के लिए मुफ्त बिजली, बीपीएल परिवारों के लिए सस्ता राशन, स्कूलों मे मिड-डे मील, नरेगा, कितने ही उदाहरण ऐसे हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि आम आदमी के नाम पर बनने वाली योजनाओं का असली लाभ अमीरों को मिलता है और गरीब लोग लाइनों में खड़े अपनी बारी का इंतज़ार करते रह जाते हैं।

सवाल यह है कि यदि लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से लाभ नहीं मिल रहा है तो क्या किया जाए? इसके लिए आवश्यक है कि गरीब और वंचित लोगों को रोज़गारपरक तथा उद्यमिता की शिक्षा दी जाए। उनकी स्किल बढ़े, वे कमाने लायक बन सकें और उत्पादकता में भी योगदान दें। दलितों को आरक्षण और गरीबों को सब्सिडी की बैसाखी देने के बजाए उन्हें रोज़ी-रोटी कमाने के लायक बनाया जाए। देश में सरकारी नौकरियों की कमी हो सकती है, नौकरियों की भी कमी हो सकती है लेकिन रोज़गार की कमी नहीं है। मुंबई के डिब्बेवाले एक आदर्श उदाहरण हैं। दूसरा उदाहरण सोशल इन्नोवेशन का है। आम आदमी, सामाजिक संगठन और कारपोरेट घराने ऐसा कर सकते हैं। हिंदुस्तान लीवर ने आंध्र प्रदेश में विधवा महिलाओं को घर-घर जाकर अपने उत्पाद बेचने की ट्रेनिंग दी जिससे कंपनी की बिक्री बढ़ी और जरूरतमंद विधवाओं को सम्मानप्रद रोज़गार मिला। कई एनजीओ और सहकारी संस्थाएं भी सम्मानप्रद रोज़गार की इस मुहिम में शामिल हैं। लिज्जत पापड़, अमुल डेयरी आदि इसके बढिय़ा उदाहरण हैं।

बीपीएल परिवारों को रोटी या पैसा देने मात्र से यह समस्या नहीं सुलझेगी। इसके लिए इन्क्लूसिव डेवेलपमेंट यानी ऐसे विकास की आवश्यकता है जिसमें उन लोगों की हिस्सेदारी हो जिन्हें वाजिब लागत पर भोजन नहीं मिलता, सार्वजनिक परिवहन नहीं मिलता, अस्पताल की सुविधा नहीं मिलती, या जिनके पास घर नहीं हैं। ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिएं जो आम लोग खरीद सकें। इसके साथ ही गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाने के ठोस उपाय भी किये जाएं। रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के अलावा उत्पादन और वितरण का ऐसा माडल तैयार करना होगा जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े और सामान भी सस्ते हों। यह सोशल इन्नोवेशन से संभव है और यह गरीबी दूर करने का शायद सबसे बढिय़ा उपाय है। हमें इसी विचार को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। 

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Thursday, December 30, 2010

मीडिया भी बढ़ाता है महंगाई

-- पी. के. खुराना

केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की राजनीतिक चालों का जवाब नहीं। पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा और कामनवेल्थ खेलों के खलनायक कलमाड़ी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उन्हें गद्दी छोडऩी पड़ी जबकि शरद पवार इतनी नफासत से काम करते हैं जिससे उनका और उनके समर्थकों का लाभ भी हो और उन पर कोई आंच भी न आये। कुछ समय पूर्व उन्होंने चीनी के दामों को लेकर बयान दिया और चीनी के दाम आसमान छूने लगे। हाल ही में उन्होंने बयान दिया कि प्याज के दाम नीचे आने में दो-तीन हफ्ते लगेंगे, परिणाम यह हुआ कि प्याज के दाम इतने बढ़ गए कि सेब भी उनके मुकाबले में सस्ते हो गये।
यहां जो बात ध्यान देने वाली है, वह सिर्फ इतनी-सी है कि गन्ना और प्याज, दोनों ही महाराष्ट्र की मुख्य फसलों में से हैं और शरद पवार चीनी मिल मालिकों तथा प्याज के थोक व्यापारियों के इस बड़े वोट बैंक का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके समर्थकों के लाभ में ही उनका भी लाभ है। परंतु अपने समर्थकों को लाभ पहुंचाने के लिए उन्हें किसी राडिया की आवश्यकता नहीं पड़ी, सिर्फ एक बयान दागा और मामला हल। राडिया ने अपना काम करवाने के लिए मीडिया के लोग गांठे और लाबिंग की। अब राडिया को सीबीआई ने घेर रखा है। लेकिन शरद पवार की नफासत का आलम यह है कि उन्होंने बयान दागा, मीडिया ने पहले तो बयान प्रकाशित किया, फिर बयान के परिणामों का जिक्र किया और शरद पवार का मकसद हल करने में उनका साथ दिया। मज़े की बात तो यह है कि शरद पवार ने मीडिया की ताकत को समझा, उसे अपने हक में प्रयोग किया और खुद मीडियाकर्मियों को भी यह समझ नहीं आया कि वे अनजाने ही शरद पवार का हथियार बन गए हैं।
आइए, इस पर जरा बारीकी से गौर करें। चीनी के दाम बढ़े तो मीडिया ने शरद पवार की आलोचना करनी आरंभ कर दी कि चीनी के दाम बढऩे से भारतीय गृहणियों का बजट गड़बड़ा गया है, आम आदमी परेशानी में है और कृषि मंत्री चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। जवाब में शरद पवार ने कहा कि वे कोई जादूगर नहीं हैं कि यह बता सकें कि चीनी के दाम कब कम होंगे। उनके बयान का ही असर था कि चीनी के दाम और भी चढ़ गए। फिर प्याज की बारी आई। मीडिया ने फिर से उनकी आलोचना की। इस बार शरद पवार ने बयान में थोड़ा सा संशोधन किया और कहा कि प्याज के दाम दो-तीन हफ्ते में नीचे आ जाएंगे। मीडिया ने इसे फिर से हाईलाइट किया और प्याज के दाम और भी चढ़ गए। यही नहीं, इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि बाकी सब्जियों के दाम भी चढ़ गए।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे प्रमुख खबरी चैनल और अखबार महानगर-केंद्रित हैं। मुंबई और दिल्ली के थोक व्यापारी तो ऐसी स्थितियों का लाभ उठाने के लिए जाने ही जाते हैं। मीडिया ने शरद पवार के बयान को उछाल कर शरद पवार के समर्थकों को उनकी मंशा का संकेत दे दिया। शरद पवार के बयान का लाभ उठाते हुए उन्होंने दाम बढ़ाये तो वे जानते थे कि सरकार अभी चुप बैठेगी। इस प्रकार मीडिया ने शरद पवार का हथियार बनकर उनका ही काम किया और उनके समर्थकों को मनमानी करने का संदेश पहुंचाया।
मीडिया के महानगर-केंद्रित होने का एक और भी नुकसान हुआ। दिल्ली और मुंबई की मंडियों में जब चीनी अथवा प्याज के दाम बढ़े थे तो देश के शेष भागों के कस्बों और गांवों में उसका प्रभाव कम था और दाम आसमान नहीं छू रहे थे पर जब मीडिया ने इस एक खबर पर ही फोकस बनाया और टीवी चैनलों ने शरद पवार के बयान को दोहरा-दोहरा कर उसकी नाटकीयता बढ़ाई तो छोटे शहरों के खुदरा व्यापारियों ने भी तुरंत दाम बढ़ा दिये। इस प्रकार मीडिया ने वस्तुत: महंगाई बढ़ाने का काम किया और आम आदमी की परेशानी में इज़ाफा किया।
खबरों का प्रभाव बढ़ाने के लिए टीवी चैनल जिस नाटकीयता का सहारा लेते हैं वह अक्सर हानिकारक ही होती है। नाटकीयता की अति समाचार प्रस्तोताओं के लिए नशा बन गया है। टीआरपी की दौड़ में लगे टीवी चैनल इस दौड़ से परेशान हैं पर वे इसका कोई प्रभावी विकल्प खोजने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। टीवी चैनलों की देखादेखी प्रिंट मीडिया भी नाटकीयता का शिकार होता चल रहा है। खबरी चैनल, मनोरंजन चैनलों की नकल कर रहे हैं और अखबार, खबरिया चैनलों की नकल पर उतारू हैं। ऐसे में कोई नीरा राडिया या शरद पवार मीडिया की ताकत का नाजायज़ फायदा उठा ले जाए तो मीडिया को भी पता नहीं चलता कि वह किसी शातिर दिमाग व्यक्ति का हथियार बन गया है। टीवी चैनलों को टीआरपी का गुड़ नज़र आता है और वे अपनी पीठ थपथपाने में जुट जाते हैं जबकि आम आदमी मीडिया की नाटकीयता का शिकार होकर परेशानी भुगतता रह जाता है।
ऐसा नहीं है कि आम आदमी को मीडिया से हानियां ही हैं। मीडिया ने आम जनता के हितों की रक्षा के कई अद्वितीय काम किये हैं। मीडिया आम आदमी का प्रहरी है और लोकतंत्र का चौथा मजबूत खंभा है। मीडिया ने बहुत से रहस्योद्घाटन किये हैं और जनता को सच से रूबरू करवाया है। मीडियाकर्मियों ने ईमानदारी से मीडिया में आ रही विकृतियों का विश्लेषण करने और उनसे निपटने के कई सार्थक प्रयास किये हैं। यह बात अलग है कि खुद मीडियाकर्मी मीडिया की कारगुजारियों की जितनी आलोचना करते हैं, आम आदमी उससे वाकिफ नहीं है। मीडिया व्यवसाय से जुड़े पेशेवरों तथा मीडिया से सीधे प्रभावित होने वाले लोगों की बात छोड़ दें तो आम आदमी की निगाह में अभी भी मीडिया का महत्व और सम्मान घटा नहीं है। अभी आम पाठक और आम दर्शक मीडिया की नाटकीयता के दुष्प्रभावों से अनजान है और वह इसका आनंद ले रहा है।
अब समय आ गया है कि मीडिया से जुड़े लोग यह देखें कि देशहित और जनहित, खबर और खबर के प्रभाव से ज्यादा बड़े हैं तथा उनके समाचारों के प्रस्तुतिकरण के तरीके से आम आदमी का नुकसान न हो। ***

Wednesday, December 15, 2010

संसद में षड्यंत्र : क्या हम जागेंगे ?

इस बार संसद में एक नई शुरुआत हुई है। 2-जी स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाले सहित भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों पर जेपीसी, यानी संयुक्त संसदीय समिति गठिन करने की विपक्ष की मांग पर भारी हंगामे के चलते भारतीय संसद के इतिहास में बने अब तक के सबसे लंबे गतिरोध के बाद संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार 13 दिसंबर को बिना किसी खास कामकाज के एक बड़े षड्यंत्र का शिकार हो गया और दोनों सदनों को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया।
संसद की एक दिन की कार्यवाही पर लगभग 7.80 करोड़ रुपये का खर्च आता है और सांसदों के हंगामे के कारण शीतकालीन सत्र में पौने दो अरब रुपये से अधिक की धनराशि व्यर्थ चली गयी। संसद के दोनों सदनों और संसदीय कार्य मंत्रालय का चालू वित्त वर्ष का कुल बजट अनुमानत: 535 करोड़ रुपये का है। संसद साल में तीन बार, यानी, बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र के लिए बैठती है। 9 नवंबर से शुरू हुए इस सत्र में 13 दिसंबर तक दोनों सदनों की 23 बैठकें हुईं। इस दौरान 23 लंबित विधेयक पारित होने थे तथा 8 नये विधेयक पेश किये जाने थे। सरकार की ओर से भी 24 नये विधेयक पेश होने थे और 3 विधेयकों को वापिस लिया जाना था, लेकिन इस सत्र में दस नए विधेयक ही पेश हो पाये जिनमें से एक वापिस ले लिया गया और 6 विधेयकों को भारी हंगामे के बीच, बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया। राज्यसभा में भी 4 में से 3 विधेयक ही पेश हुए और 7 विधेयकों में से केवल रेलवे और सामान्य बजट की अनुपूरक मांगों से जुड़े 4 विधेयक पारित हुए।
इस सत्र के शुरू होने के अगले ही दिन जेपीसी के गठन की मांग को लेकर गतिरोध आरंभ हो गया जो अंत तक बना रहा। तेइस दिन के इस सत्र में कुल मिला कर करीब दस घंटे ही सदन चल पाये और वह भी हंगामे के बीच। शीतकालीन सत्र में लोकसभा में केवल एक दिन प्रश्नकाल चला तो राज्यसभा में एक भी दिन ऐसा अवसर नहीं आया जब सदस्य अपने मौखिक या पूरक प्रश्न पूछ पाते। शोर-शराबे और अव्यवस्था से दोनों सदनों की कार्यवाही इस हद तक प्रभावित रही कि सरकारी कामकाज के अलावा, हर शुक्रवार को होने वाले गैर-सरकारी कामकाज भी नहीं हो पाये। जो आवश्यक वित्त विधेयक पास हुए, वे बिना किसी चर्चा के पास हुए। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य विधेयक पेश कराये गए, और बस। यह था 23 दिनों के कामकाज का लेखा-जोखा।
भारतीय संसद के इतिहास में यह अब तक का सबसे लंबा गतिरोध था। 1987 में बोफोर्स मामले को लेकर जेपीसी की मांग की गई थी। वह गतिरोध 45 दिन चला था पर कामकाज इस प्रकार पूरी तरह से ठप नहीं हुआ था। इस बार यह नई शुरुआत हुई है कि पूरा सत्र ही एक बड़े षड्यंत्र की भेंट चढ़ गया।
सत्र की समाप्ति पर सोनिया गांधी ने कहा है कि उनके पास छुपाने का कुछ नहीं था, पर उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या बताने को भी कुछ नया था या नहीं। उधर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि कभी-कभी संसद में कार्यवाही नहीं चलने देने से भी परिणाम निकलते हैं। मीडिया में इस सत्र को लेकर बड़ी-बड़ी खबरें आयी हैं। चर्चाएं होंगी, बहस चलेगी और फिर सब कुछ शांत हो जाएगा। मैंने बार-बार दोहराया है कि यह एक बड़ा षड्यंत्र था। आइए, समझें कि षड्यंत्र क्या था, इस हंगामे से किसे लाभ हुआ और वह लाभ क्या था।
2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार को लाखों करोड़ का चूना लगा। देश का हर नागरिक इस घोटाले के लेकर चिंतित और नाराज है। यह विपक्ष का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी था कि वह इस घोटाले को लेकर सवाल उठाता ताकि देश की जनता को सच्चाई का पता चल सके। विपक्ष ने इस घोटाले की जांच के लिए जेपीसी के गठन की मांग की। मांग नाजायज़ नहीं थी। लेकिन इसका कोई औचित्य नहीं है कि जेपीसी के गठन को लेकर पूरा सत्र ही इसकी भेंट चढ़ जाए। विपक्ष यह बताने को तैयार नहीं है कि जेपीसी के गठन से कितना सच सामने आता, उस पर क्या कार्यवाही होती और उस कार्यवाही का क्या परिणाम निकलता। न ही कोई यह बताता है कि पूर्व में किसी संयुक्त संसदीय समिति के गठन के बाद कितनी बार देश के सामने पूरा सच आया, भ्रष्टाचार पर लगाम लगी और ऐसा कोई पुख्ता इंतज़ाम हुआ कि अगली बार कोई और घोटाला फिर न हो। सवाल यह भी है कि क्या देश के सामने जनहित का कोई और मुद्दा, कोई और समस्या नहीं थी कि उस पर चर्चा ही न हो पाये।
जेपीसी के गठन को लेकर हंगामा मचाने मात्र से विपक्ष को लगातार प्रचार मिला। हंगामे और अभूतपूर्व गतिरोध के कारण विपक्ष को जो प्रचार मिला वह देश भर में इंटरव्यू देकर, प्रेस कांफ्रेंस करके तथा कई रचनात्मक कार्यक्रम चलाकर भी न मिलता। ध्यान देने की बात है कि इस बीच विपक्ष ने कभी यह नहीं कहा कि देश की अमुक समस्या के समाधान के लिए उसके पास अमुक योजना है। विपक्ष ने कभी यह भी नहीं बताया कि वह जनहित के लिए कौन-कौन से कार्यक्रम चला रहा है और उनका अभी तक क्या परिणाम निकला है। विपक्ष यह भी बताने को तैयार नहीं है कि वह कौन-सा ऐसा सवाल है जो संसद में बहस के दौरान नहीं उठाया जा सकता था।
हमें यह समझना चाहिए कि धरना देना और जुलूस निकालना किसी समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने का साधन मात्र है, समस्या का समाधान नहीं है। हंगामे के कारण विपक्ष ने सारे देश का ध्यान इस घोटाले की ओर आकर्षित किया और यह जताया कि यह मुद्दा महत्व के लिहाज से सर्वोपरि है। पर उसके बाद क्या हुआ? इस समस्या के समाधान के लिए विपक्ष की ओर से और क्या किया गया?
विपक्ष अब कोई रचनात्मक कार्य नहीं करता। पदयात्राएं, जुलूस, धरना, जनसभाएं, विधानसभाओं अथवा संसद में सवाल और सवाल से भी ज्यादा शोर-शराबा, प्रेस कांफ्रेंस और मीडिया इंटरव्यू, इसके आगे विपक्ष जाता ही नहीं, जाना ही नहीं चाहता। क्या विपक्ष की जिम्मेदारी सिर्फ यहीं समाप्त हो जाती है?
उधर, सरकार ने विपक्ष की जेपीसी के गठन की मांग को नहीं माना जिसके कारण गतिरोध बना और संसद में कामकाज ठप हो गया, इसका जितना लाभ सत्तापक्ष को मिला उतना विपक्ष को भी नहीं मिला। सत्तापक्ष की सफाई थी कि वह तो चाहता है कि संसद चले और हर मुद्दे पर बहस हो, जबकि संसद न चल पाने के कारण सत्तापक्ष हर असुविधाजनक सवाल से बच गया। इस प्रकार गतिरोध का असली लाभ तो सत्तापक्ष को ही मिला क्योंकि सरकार संसद में हर तरह की किरकिरी से बच गई। यही नहीं, कांग्रेस के लिए यह बड़ी राहत की बात है कि स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण बने गतिरोध ने कामनवेल्थ खेलों के घोटाले को पृष्ठभूमि में धकेल दिया। सत्तापक्ष ने कभी भी यह साफ नहीं किया कि यदि उसे बहस से डर नहीं है तो फिर जेपीसी के गठन से उसे क्या डर है।
हंगामे से पक्ष और विपक्ष दोनों को लाभ हुआ। नुकसान हुआ देश की जनता को जो अपने इन प्रतिनिधियों की बेशर्म हरकतों को चुपचाप सहने के लिए विवश है। दरअसल, पक्ष और विपक्ष इस सवाल पर बंटे हुए नहीं हैं। यह दोनों पक्षों के लिए एक सुविधाजनक स्थिति है कि संसद में गतिरोध बनाओ, अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से बचे रहो और प्रचार भी पाओ।
भारतीय मीडिया का रुख इस सवाल पर बहुत उथला है। मीडिया ने इस सवाल को उठाया ही नहीं कि जेपीसी की मांग के अलावा विपक्ष का कर्तव्य क्या है और सत्तापक्ष को जेपीसी के गठन से इतना डर क्यों लग रहा है कि उसने लगभग 175 करोड़ रुपये की बड़ी धनराशि पानी में बह जाने दी। अगली बार वोट देते समय जनता को भी देखना चाहिए कि उसके प्रतिनिधि संसद और विधानसभा में कैसा व्यवहार करते हैं। जब तक हम मतदाताओं में इस तरह की जागरूकता नहीं आयेगी, हमारा लोकतंत्र इसी तरह लंगड़ा और आधा-अधूरा बना रहेगा। ***