Wednesday, November 9, 2016

BINGO -- The best Italian, Chinese & Thai Restaurant in Triciy

One can relish sumptuous Pizza , Pasta, Burgers, Sandwiches, Tacos, Quesadillas, Breads, Noodles, Chopsuey, Rice and Gravies at Tricity's best Italian, Chinese & Thai Restaurant, namely, BINGO, SCO 37, First Floor, Sector 67, Mohali. It is a dine-in and home-delivery Italian, Chinese & Thai Restaurant with dance floor. The interiors are unique and eye-pleasing.

One can visit BINGO and enjoy the freshly made Pizza, Pasta, Burger, Sandwich, Taco, Quesadillas, Garlic Breads, Chicken Wings, Noodles, Chopsuey, Rice, Gravies, Starters and other Snacks. The Pizza Cone and the dessert Pizza, namely, Dilruba Special are a real treat for anyone.

One can also order food at 7696 01 01 88 / 7696 01 01 99 or go to the BINGO website, www.BingoFoods.co.in and view menu online, order online, pay online or pay in cash at the time of delivery of food. BINGO operates between 11 am to 11 pm, all 7 days a week and the delivery orders are accepted till 10.30 pm. Deliveries are made in all Sectors and Phases of Mohali.

BINGO
Italian, Chinese & Thai Restaurant
Dine-in + Home-Delivery

SCO 37, First Floor, Sector 67
Mohali - 160062 (Punjab)
Phones : 7696 01 01 88
               7696 01 01 99

11 am - 11 pm. All 7 Days a Week
Delivery in ALL Sectors of Chandigarh & Mohali


Saturday, November 24, 2012

तमसो मा ज्योतिर्गमय




तमसो मा ज्योतिर्गमय
                                                                                                        l पी. के. खुराना
तमसो मा ज्योतिर्गमय, यानी, 'हे प्रभु, हमें अंधकार से प्रकाश में ले चल!’ -- यह हमारी शाश्वत प्रार्थना है। अंधकार से प्रकाश की ओर की यात्रा अज्ञान से ज्ञान की ओर की यात्रा है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि अज्ञानवश और काम तथा पारिवारिक  जि़म्मेदारियों के बोझ तले दब कर तथा आधुनिक जीवन शैली के कारण हम जिस प्रकाश की उपेक्षा कर रहे हैं, उससे हम अपना कितना नुकसान करते हैं? यहां हम सूर्य के प्रकाश की बात कर रहे हैं।
सूर्य का प्रकाश इतना स्वास्थ्यकर माना जाता है कि प्राचीन भारतीय योग गुरुओं ने सूर्य नमस्कार के रूप में हमें सूर्य की ऊर्जा का लाभ लेने की शिक्षा दी। सूर्य का प्रकाश विटामिन-डी का भंडार है और अक्सर नवजात बच्चों को सुबह सवेरे वस्त्ररहित स्थिति में सूर्य की रोशनी में रखा जाता है। खेद की बात है कि आधुनिक जीवन शैली ने हमसे यह सुविधा छीन ली है और शहरों में रहने वाली आबादी का एक बड़ा भाग सूर्य के दर्शन ही नहीं करता।
शहरी जीवन में ऊंची अट्टालिकाओं में बने कार्यालय, एक ही मंजिल पर कई-कई कार्यालयों के होने से हर कार्यालय में सूर्य के प्रकाश की सीधी पहुंच की सुविधा नहीं है। यही नहीं, जहां यह सुविधा है, वहां भी बहुत से लोग भारी परदों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को बाहर रोक देते हैं और ट्यूबलाइट तथा एयर कंडीशनर में काम करना पसंद करते हैं। घर से कार्यालय के लिए सुबह जल्दी निकलना होता है। हम बस पर जाएं, ट्रेन पर जाएं या अपनी कार से जाएं, गाड़ी में बैठे रहने पर सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होता, अधिकांश कार्यालयों में सूर्य का प्रकाश नहीं होता और शाम को दफ्तर से छुट्टी के समय भी फिर गाड़ी का लंबा सफर हमें सूर्य के प्रकाश से वंचित कर देता है। घर आकर हम परिवार अथवा टीवी में यूं गुम हो जाते हैं कि सूर्य के प्रकाश की परवाह नहीं रहती। इस प्रकार हम प्रकृति के एक अनमोल उपहार से स्वयं को वंचित रख रहे हैं और अपने स्वास्थ्य का नुकसान कर रहे हैं।
इसी समस्या का एक और पहलू भी है जिसका पूरे वातावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। औद्योगिक विकास ने जहां एक ओर अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, वहीं बहुत से गैरजि़म्मेदार उद्योगपतियों ने उद्योग लगाते समय प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली न विकसित करके पर्यावरण का बहुत नुकसान किया है। उद्योग और व्यवसाय में माल की ढुलाई के कारण ट्रकों से निकलने वाली गैसों से प्रदूषण फैलता है। गैरजि़म्मेदारी के पैमाने पर व्यक्तिगत रूप से भी हम लोग किसी से पीछे नहीं हैं। सुविधाजनक जीवन जीने के आदी हो चुके बहुत से लोगों के पास अपनी गाड़ियां हैं। होली-दीवाली के समय तो हम प्रदूषण फैलाते ही हैं, रोज़मर्रा की जि़दगी में भी गाड़ियों का अधिक से अधिक प्रयोग करके, हमने न केवल सड़कों पर भीड़ बढ़ाई है, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है। पर्यावरण के प्रदूषण का कारण है कि सूर्य की रोशनी ज़्यादा समय तक पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाती और शाम जल्दी ढल जाती है।
भारतीय मौसम विभाग तथा अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लीकेशन सेंटर) के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि तमाम तरह के प्रदूषण के कारण सूर्य की रोशनी के पृथ्वी तक सीधे पहुंचने का समय लगातार घटता जा रहा है जिसके कारण धूप और रोशनी का तीखापन प्रभावित हो रहा है जिससे दिन की लंबाई का समय घट जाता है। इससे शाम जल्दी ढलती है और हमें सूर्य की ऊर्जा का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, बल्कि इससे स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि सन् 1971 से सन् 2005 के बीच पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की सीधी रोशनी में गिरावट के कारण वर्ष भर की औसत दैनिक रोशनी का समय 8.4 घंटों से घट कर साढ़े सात घंटे रह गया है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, वाहनों और उद्योगों से होने वाले प्रदूषण, फसलों और सूखे पत्तों को खुले में जलाए जाने, बायोमास पदार्थों के जलने आदि से हवा में फैले कार्बन कणों के कारण कालिख बढ़ जाती है। यह कालिख सूर्य की रोशनी को जज्ब कर लेती है और उसकी आगे की यात्रा में व्यवधान पैदा करती है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता सहित सभी बड़े शहरों में पर्यावरण प्रदूषण की यह अवांछनीय बीमारी बढ़ रही है जो दिन की रोशनी के समय को प्रभावित करती है। शिलांग जैसे पर्वतीय स्थानों पर इसका असर कम है लेकिन महानगरों में दिन का समय घट चुका है और वैज्ञानिकों को आशंका है कि पिछले 40 वर्षों में दिन की रोशनी की औसत अवधि 10 प्रतिशत के आसपास घट गई है।
दिन की रोशनी को घटाने वाले प्रदूषणकारी तत्व मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं और इससे सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि कम रोशनी वाले दिनों की अपेक्षा तेज रोशनी वाले दिनों में हमारे मस्तिष्क से सेरोटोनिन नामक द्रव्य ज्यादा मात्रा में पैदा होता है जो हमारी मन:स्थिति (मूड) को खुशनुमा बनाता है। यदि धुंधलका लगातार बना रहे तो मन:स्थिति के विकार भी बढ़ सकते हैं।
पर्यावरण के प्रदूषित होने से हमें नुकसान हो रहा है, इसमें तो कोई शक है ही नहीं, अध्ययन सिर्फ यह बताएंगे कि यह नुकसान किस हद तक है और इससे हमारे स्वास्थ्य पर जो बुरा असर पड़ेगा उसके परिणाम क्या हो सकते हैं। मौसम और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिक एकमत हैं कि सूर्य की रोशनी के पृथ्वी पर आने का समय घटने से स्वास्थ्य संबंधी कई नई परेशानियां आयेंगी। खेद की बात है कि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई भी जागरूकता अभियान नहीं चलाया जा रहा और न ही स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिया है जबकि यह अध्ययन पिछले 40-45 वर्षों से जारी है।
यह एक विडंबना ही है कि हम लोग सुविधासंपन्न जीवन के इस हद तक आदी हो चुके हैं कि अब हमें प्राकृतिक जीवन जीना असंभव लगने लगा है। आधुनिक जीवन शैली हमारे जीवन को आसान तो बना रही है पर यह उसे बीमार भी बना रही है। यह एक ऐसा अंतर्विरोध है जिसका तोड़ यही है कि कार्यालय जाने वाले लोग दोपहर के भोजन के अवकाश के समय सैर को निकलें और सूर्य की रोशनी से शरीर को ऊर्जा दें, शनिवार, रविवार तथा अवकाश वाले अन्य दिनों में खुले में ज्यादा समय बिताएं अथवा अपना दिन कुछ और पहले आरंभ करें और कार्यालय जाने से पहले खुले में योगाभ्यास करते हुए अथवा फुटबाल या बैडमिंटन जैसा कोई खेल खेलते हुए व्यायाम और सूर्य की ऊर्जा दोनों का सम्मिलित लाभ लें। हमें याद रखना चाहिए कि लंबे सुखमय जीवन के लिए सुविधा वांछनीय है परंतु स्वास्थ्य आवश्यक है। ***

P. K. Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

Alternative Journalism
वैकल्पिक पत्रकारिता

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pkk@lifekingsize.com


जलाओ दिमाग की बत्ती




जलाओ दिमाग की बत्ती
                                                                                                                                l पी. के. खुराना
जनसामान्य में पीजीआई के नाम से प्रसिद्ध चंडीगढ़ स्थित चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के स्नातकोत्तर संस्थान 'पोस्टग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्चसे जुड़े तीन अलग-अलग अध्ययनों ने मेरे दिमाग की बत्ती जलाई है और मुझे उम्मीद है कि ये अध्ययन कुछ और लोगों के दिमाग की बत्ती भी जला सकते हैं।
मेरे मित्र और हास्य की दुनिया के बेताज बादशाह रहे स्वर्गीय जसपाल भट्टी ने अपने प्रसिद्ध कार्यक्रम उलटा-पुलटा के एक शो में आधुनिक जीवन की विकृति को चित्रित करते हुए बताया था कि आज के बच्चे खेल के नाम पर कंप्यूटर गेम्स या प्ले स्टेशन गेम्स में खोये रहते हैं और इस कारण शारीरिक गतिविधियों और व्यायाम से उनका नाता टूट गया है जिसके कारण उन्हें छोटी उम्र में ही स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं।
आज लगभग हर घर में केबल टेलिविज़न सुविधा उपलब्ध है, यानी सारा साल, हर रोज़, चौबीसों घंटे टीवी के किसी न किसी चैनल पर कोई न कोई मनोरंजक अथवा मनपसंद कार्यक्रम आ ही रहा होता है। हर कोई टीवी का दीवाना है। छोटे बच्चे कार्टून कार्यक्रमों में मस्त हो जाते हैं। मां-बाप इसे बड़ी सुविधा मानते हैं क्योंकि कार्टून शो में खोये बच्चे को कुछ भी और कितना भी खिलाना आसान होता है, बच्चा टीवी में व्यस्त हो जाता है और घर से बाहर नहीं जाता, शरारतें नहीं करता, फालतू की जि़द नहीं करता। संपन्न आधुनिक शहरी घरों में बच्चों के लिए प्ले स्टेशन पोर्टेबल (पीएसपी) भी उपलब्ध हैं और बच्चे इनमें खोये रहते हैं।
मां-बाप सोचते हैं कि बच्चा कार्टून ही तो देख रहा है, लेकिन वे उससे होने वाले दिमागी प्रभाव को नहीं समझ पाते। कार्टून शो में सीन बदलने की गति यानि फ्लिकरिंग इतनी तेज़ होती है कि कई बार बच्चे का दिमाग उसे पकड़ नहीं पाता और वह कन्फ्यूज़ हो जाता है। इससे बच्चे को उलटी होने जैसा महसूस हो सकता है। सीन बदलने के कारण रोशनी की तीव्रता तेजी से घटती-बढ़ती है, जिसे फ्लैशिंग कहते हैं। इससे भी बच्चों की आंखों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जिसे फोटोफोबिया कहा जाता है। लगातार कार्टून देखने वाले अथवा प्ले स्टेशन पर खेलने वाले बच्चे अक्सर इसीलिए बाद में थकान महसूस करते हैं और उन्हें मिरगी की शिकायत हो सकती है। पीजीआई में पीडियाट्रिक मेडिसिन की प्रोफेसर डा. प्रतिभा सिंघी तथा पीजीआई के ही स्कूल ऑव पब्लिक हेल्थ के डा. सोनू गोयल ने शहर के दो दर्जन से अधिक स्कूलों में हुए एक सर्वेक्षण के परिणामों की पुष्टि करते हुए बताया कि बच्चों द्वारा लंबे समय तक कार्टून देखना अथवा प्ले स्टेशन पर खेलना उनकी सेहत के लिए खतरनाक है।
अल्ज़ाइमर एक ऐसी बीमारी है जिससे ग्रस्त व्यक्ति रोज़मर्रा की साधारण चीजों को भी भूलने लगता है, मसलन, अलमारी खोलनी हो तो फ्रिज खोलकर खड़े हो जाएं, बात करते समय भूल जाएं कि बातचीत का विषय क्या था, अपनी कोई बात समझाने के लिए किसी विशिष्ट घटना का जिक्र शुरू कर दें और यह भूल जाएं कि उस उदाहरण से समझाना क्या चाहते थे, हाथ में पकड़ी या गोद में पड़ी किसी चीज को इधर-उधर ढूंढ़ें। 'डिमेंशियाÓ यानी दिमाग के तंतुओं के मरने के कारण होने वाली बीमारी अल्ज़ाइमर से बचने के लिए तथा स्मरण शक्ति के विकास के लिए आयुर्वेद ब्रह्मी बूटी के प्रयोग की सिफारिश करता है।
पीजीआई में न्यूरोलाजी विभाग के प्रोफेसर व मुखिया डा. सुदेश प्रभाकर के अनुसार चूहों पर किए प्रयोगों से डाक्टरों ने पाया है कि भूलने की बीमारी के इलाज के लिए ब्रह्मी बूटी सचमुच लाभदायक है और अब वह भूलने की बीमारी से ग्रस्त मरीजों पर ब्रह्मी बूटी के क्लीनिकल प्रयोग की तैयारी कर रहे हैं। इसके तहत डिमेंशिया से पीड़ित सौ मरीजों का चयन किया गया है। इनमें से 50 को परंपरागत एलोपैथी दवाएं दी जाएंगी और बाकी 50 को ब्रह्मी से बनी दवाएं। फर्क यह है कि ब्रह्मी से बनी दवाओं की गुणवत्ता और पैकिंग आदि का जिम्मा पीजीआई के ही फार्माकोलाजी विभाग को दिया गया है, जहां मान्य अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी ध्यान रखा जाएगा ताकि दवा के परिणाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश किए जा सकें। इस परियोजना की देखरेख कर रही टीम में पीजीआई के न्यूरोलाजी विभाग के डाक्टरों के अलावा एक आयुर्वेदाचार्य को भी शामिल किया गया है।
दिल्ली में रह रहीं डा. पूनम नायर ने चंडीगढ़ योग सभा के तत्वावधान में पीजीआई के साथ मिलकर विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को योगासनों से इलाज की पद्धति का अध्ययन किया ही, साथ ही उन्होंने पीजीआई में कार्यरत नर्सों को भी योगासन के माध्यम से अपने कार्य में दक्षता लाने की शिक्षा दी। यह अध्ययन चिंता, तनाव और उदासी से ग्रस्त मरीजों, उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) से ग्रस्त मरीजों और काम के दबाव से ग्रस्त नर्सों पर आधारित था। मरीजों को तीन समूहों में बांटा गया, पहले समूह को परंपरागत एलोपैथिक दवाइयां दी गईं, दूसरे समूह को यौगिक क्रियाओं, योगासनों, यौगिक प्राणायाम और योग मुद्राओं और काउंसलिंग की यौगिक चिकित्सा दी गई और तीसरे समूह को शवासन, प्राणायाम, खुशी और सफलता की स्थिति में स्वयं की कल्पना करने, अपने इष्ट भगवान के ध्यान आदि से यौगिक विश्राम से संबंधित क्रियाएं करवाई गईं।
डाक्टरों और नर्सों का जीवन बहुत कठिन होता है और लगातार रोगियों के संपर्क में रहने के कारण उनका अपना स्वास्थ्य हमेशा खतरे में रहता है। काम का दबाव उन्हें चिड़चिड़ा बना देता है और वे तनावग्रस्त हो सकते हैं। इसीलिए डा. पूनम नायर ने योग क्रियाओं का प्रयोग नर्सों पर भी किया। मरीजों और नर्सों पर यह प्रयोग कुछ वर्ष चला और इसके परिणाम आश्चर्यजनक रूप से उत्साहवर्धक रहे।
आज हमारा जीवन बहुत व्यस्त है और करिअर की दौड़ में सरपट भागते हुए हम सोच ही नहीं पा रहे कि हम जीवन में क्या खो रहे हैं। एकल परिवार में कामकाजी दंपत्ति के बच्चे अकेलापन महसूस करने पर टीवी और प्ले स्टेशन में व्यस्त होने की कोशिश करते हैं। भावनात्मक परेशानियों से जूझ रहा बच्चा एक बार इनका आदी हो जाए तो वह कई स्वास्थ्य समस्याओं का शिकार हो जाता है। किशोर अथवा युवा होते बच्चे भी व्यायाम के बजाए डिस्कोथेक के रेशमी अंधेरों, चौंधियाने वाली रोशनियों और तेज संगीत के शोर में गुम होते हुए सोच ही नहीं पाते कि उनका जीवन किन किस ओर बढ़ रहा है।
पीजीआई के उपरोक्त तीनों अध्ययनों का लब्बोलुबाब यह है कि योग और आयुर्वेद को एलोपैथी के शोध और गुणवत्ता के मानकों से जोड़ दिया जाए तो चिकित्सा विज्ञान विकसित होगा और रोगियों को लाभ होगा। इन अध्ययनों का एक और महत्वपूर्ण सबक यह भी है कि परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताएं और एक-दूसरे को भावनात्मक सहयोग दें। परिवार के सदस्यों का साथ और प्यार किसी भी बच्चे के लिए वरदान है जो उसे जीवन की कठिनाइयां झेलने के काबिल बनाता है और नशे और बीमारी की परेशानियों से बचाए रखता है। इस मंत्र की उपेक्षा करना आसान है पर उससे उत्पन्न होने वाली परेशानियों का सामना करना बहुत मुश्किल है। ***

P. K. Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

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Sunday, September 16, 2012

Terrorism Turmoil : आतंकवाद का जलजला





आतंकवाद का जलजला :: Aatankvaad Ka Jaljalaa

By : PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

प्रमोद कृष्ण खुराना

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आतंकवाद का जलजला
 पी. के. खुराना


दिल्ली उच्च न्यायालय में दूसरे धमाके के बाद आगरा में भी दहशतगर्दों ने अपना खेल खेला और कई जानें गईं। हमेशा की तरह सरकार की तरफ से निरर्थक बयानबाज़ी का दौर चला और टीवी चैनल भी दो दिन के लिए व्यस्त हो गए। यह खेदजनक है कि आम भारतवासी को लगता है कि अब आतंकवाद हमारे जीवन का हिस्सा बनकर रह गया है और पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां और सरकार इसमें कुछ खास नहीं कर सकते। ये सब आपस में ही एक दूसरे पर दोषारोपण करके अपने काम से छुटकारा पा लेने के आदी हो गये हैं। सरकार के पास न महंगाई का कोई इलाज है और न आतंकवाद का। महंगाई गरीबों की जान लेती है, पर आतंकवाद किसी को नहीं बख्शता, आतंकवादियों तक को नहीं!

आतंकवाद की दो किस्में हैं, घरेलू आतंकवाद और वैश्विक आतंकवाद। बहुत से देश वैश्विक आतंकवाद को अपने राजनीतिक, रणनीतिक, सामरिक या आर्थिक हित साधने के लिए भी प्रयोग करते हैं। आतंकवाद घरेलू हो या वैश्विक, वस्तुत: वह कानून व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। पंजाब के स्व. मुख्यमंत्री बेअंत सिंह सदैव कहते थे कि आतंकवाद की समस्या कानून और व्यवस्था का प्रश्न है और इसे इसी ढंग से हल किया जाना चाहिए। उन्होंने पंजाब की जड़ों तक पैठे आतंकवाद को नेस्तनाबूद कर दिखाने का इतिहास बनाया।

यह सही है कि हमारे कई पड़ोसी देश आतंकवाद को जि़ंदा रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन आतंकवाद के जारी रहने के और भी कई कारण हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवाद के जारी रहने में आतंकवाद से जुड़े लोगों का ही नहीं राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों का भी स्वार्थ सधता है क्योंकि आतंकवाद के कारण ये सब मोटी कमाई करते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में असम सबसे बड़ा प्रदेश है जो आतंकवाद से त्रस्त है। असम में बंाग्लादेश से आने वाले लोगों को इसलिए नहीं रोका जाता क्योंकि वे कांग्रेस के लिए बड़ा वोट बैंक हैं। आतंकवादी और सरकार एक दूसरे के सहयोगी नहीं हैं, पर दोनों एक दूसरे को पूरी तरह से खत्म भी नहीं करना चाहते क्योंकि एक के अस्तित्व में ही दूसरे की कमाई है। इस प्रकार बांग्लादेशी घुसपैठिये, सरकार और आतंकवादियों के इस अव्यक्त गठजोड़ के कारण भारत में आ बसते हैं और यहीं बसे रह जाते हैं। आतंकवाद की समाप्ति के लिए सहायता के तौर पर राज्य को केंद्र से खरबों रुपये मिलते हैं। मगर यह सहायता राजनीतिज्ञों और अधिकारियों तक सीमित रह जाती है।

आतंकवाद से जुड़ा सच ऐसा है कि सहसा विश्वास नहीं होता। आतंकवादी नेताओं को विभिन्न स्रोतों से तगड़ा धन मिलता है। यही नहीं, आतंकवाद की रोकथाम के लिए सरकारों को केंद्र से भी बड़ी सहायता मिलती है। इस सहायता का अधिकांश भाग राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी डकार जाते हैं। यानी आतंकवाद फैलाने वाले और उसकी रोकथाम करने वाले, दोनों ही के लिए आतंकवाद मोटी कमाई का साधन है।

आतंकवादियों को समाज के कई वर्गों की सहानुभूति मिल जाती है। आतंकवादी उनकी भावनाओं का शोषण करते हैं और बड़े आतंकी नेता अपने लिए अकूत धन-संपदा इक_ी कर लेते हैं। कई आतंकवादी संगठनों को धर्म और मजहब के नाम पर बड़ा दान मिलता है। इसके अलावा बहुत से देश भी अपनी आवश्यकतानुसार किसी दुश्मन देश में आतंकवाद फैलाने के षडयंत्र में शामिल रहते हैं। आतंकवाद से जुड़े लगभग सभी संगठन नशे के व्यापार से भी जुड़े हुए हैं और हथियार खरीदने के लिए उन्हें यहीं से पैसा मिलता है।

आतंकवाद से जुडऩे वाले लोगों की बड़ी संख्या निचले वर्ग के लोगों की है। समाज से तरह-तरह के अत्याचार सह चुके ये दबे-कुचले लोग आतंकवादी बनकर शक्तिशाली महसूस करते हैं, पर साथ में इसमें धनलाभ की भी बड़ी भूमिका है। आतंकवादी यदि सरेंडर करे तो उसके पुनर्वास के लिए बैंक से कर्जा, ग्रांट आदि की सरकारी सहायता मिलती है, जो अन्यथा नहीं मिलती। बहुत से लोग इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आतंकवादी बनते हैं। आतंकवादी रहते हुए आतंकवादियों को विदेशों से जो पैसा मिलता है, उन्हें उसका हिसाब-किताब देने की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार जो लोग आतंकवाद का साथ देते हैं वे दोनों तरह से धनलाभ से आकर्षित होते हैं।

वैश्विक आतंकवाद अक्सर किसी ऐसे देश से जुड़ जाता है जो अपने विभिन्न हितों की खातिर आतंकवादियों को प्रश्रय देता है। यह दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे ज्यादातर देशों में मुस्लिम बहुल आबादी है जिसके कारण पूरा मुस्लिम समुदाय ही बदनामी झेल रहा है। सच तो यह है कि मुस्लिम समुदाय को ही आतंक का पर्याय मान लेने से भी समस्या जटिल होती है और सरकारें समस्या के सही समाधान तक नहीं पहुंच पातीं।

मोटी बात यह है कि यदि हम आतंकवाद से मुक्त होना चाहते हैं तो हमें आतंकवाद को देशद्रोह का दर्जा देना होगा और इसमें शामिल हर व्यक्ति और संगठन को देशद्रोही मानना होगा। आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार और समाज के सभी अंगों में समन्वय आवश्यक है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और सामाजिक संगठन, सभी को एकजुट होकर योजनाबद्ध तरीके से आतंकवाद का मुकाबला करना होगा। अपनी सुरक्षा एजेंसिंयों को सही प्रशिक्षण और स्वतंत्रता देनी होगी, उन्हें आधुनिकतम हथियारों से लैस करना होगा। पंजाब के अलावा हमारे सामने एक और बहुत अच्छा उदाहरण मौजूद है। 1985 बैच के आईपीएस अधिकारी जे.के.त्रिपाठी ने सन् 1999 में जब त्रिची के पुलिस कमिश्नर के रूप में कामकाज संभाला तो वहां सांप्रदायिक लावा उबल रहा था और उस ज्वालामुखी में विस्फोट कभी भी संभव था। उन्होंने अपनी निष्ठा और सूझबूझ से वहां की पुलिस के चरित्र में करिश्माई परिवर्तन ला दिया। लब्बोलुबाब यह कि आतंकवाद भी कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान संभव न हो पर उसके लिए गहन निरीक्षण, आत्म-अनुशासन, आत्मविश्वास, धैर्य और अदम्य साहस की आवश्यकता है। क्रांतिकारी परिवर्तन सिर्फ सोच से ही संभव नहीं होते, उनके लिए कदम-कदम पर लड़ाई लडऩी होती है और साथियों को साथ रखना होता है। यह भी सही है कि आतंकवाद के प्रतिरोध के लिए काफी पैसा खर्च होगा पर आतंकवाद जारी रहने से होने वाले नुकसान के मुकाबले में यह बहुत कम है और इस मामले में लापरवाही खतरनाक साबित हो रही है। आतंकवाद जारी रहने से पर्यटन पर बुरा असर पड़ता है, उद्योग धंधे बंद होते हैं, कामगरों को काम नहीं मिलता और उद्योगों को कामगर नहीं मिलते जिससे पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।

अभी तक हमारी सरकारों ने आतंकवाद के मामले में बहुत ढुलमुल रवैया अपनाया है। यूपीए सरकार तो इस मामले में पूरी तरह से विफल रही है। यह खेदजनक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा इस सरकार के एजेंडे में काफी नीचे है। यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम था लेकिन उसमें आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का मुद्दा शामिल ही नहीं था। जब तक सरकार इस मामले में मजबूत इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं करेगी, आतंकवाद जारी रहेगा, निरपराध नागरिक काल-कवलित होते रहेंगे, जान-माल का नुकसान होता रहेगा और सरकार की बयानबाज़ी जारी रहेगी।

हमारी समस्या यह है कि हम आतंक के खिलाफ लड़ाई में सिर्फ प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही कर रहे हैं यानी आतंकवाद की किसी घटना के बाद जागते हैं, अन्यथा हमारी सुरक्षा एजेंसियां, पुलिस और सरकार सोए रहते हैं। इस स्थिति को बदलना होगा। देखना यह है कि सरकार खुद जागती है या इसके लिए भी हमें किसी अन्ना हज़ारे की आवश्यकता होगी। 


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Pioneering Alternative Journalism in India : PK Khurana

गलत होता व्याकरण



गलत होता व्याकरण :: Galat Hota Vyaakaran

By :
PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

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गलत होता व्याकरण
 पी. के. खुराना

हर भारतीय चाहता है कि भारतवर्ष उन्नति करे, एक विकसित देश बने और देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सारी सुविधाएं मौजूद हों। इसके लिए हमें गहन विचार की आवश्यकता है। गड़बड़ सिर्फ यह है कि हम सिर्फ विचार ही करते रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ते। भारत में हम चर्चा करते हैं, बहस करते हैं, सम्मेलन करते हैं, सेमिनार करते हैं खूब बातें करते हैं और इस तरह जताते हैं मानो किसी भी जनसुविधा का सुधार हमारा काम न हो, और नतीजतन बिलकुल भी कार्य नहीं करते हैं।

श्री सी. के. प्रह्लाद ने एक बार इन्फोसिस के चीफ मेंटर श्री नारायणमूर्ति से कहा था – ‘विकासशील देश होना महज एक मानसिकता है।’ श्री नारायणमूर्ति की तरह मैं भी इस कथन से सहमत हूं। श्री नारायणमूर्ति कहते हैं कि सत्तर के दशक में जब वे फ्रांस गए तो उन्होंने विकसित देश और विकासशील देश की मानसिकता का फर्क स्पष्ट देखा। फ्रांस में हर कोई इस तरह दिखाता है मानो जनसुविधाएं सुधारने पर चर्चा करना, बहस करना और उस दिशा में फटाफट काम करना उनका ही काम हो। भारत में हम इसके एकदम विपरीत काम करते हैं। हम या तो उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं या फिर सिर्फ चर्चा करते रह जाते हैं। हमारे यहां तो प्रधानमंत्री भी भाषण करते हैं तो वे कहते हैं – ‘गरीबी दूर होनी चाहिए!’ मानो, भारत की गरीबी दूर करना बराक ओबामा का काम हो!

आज हमारी मानसिकता गलत है, व्याकरण गलत है। ‘ऐसा होना चाहिए’, ‘वैसा होना चाहिए’ आदि को छोड़कर हमें अब ‘मैं करूंगा’ पर आने की ज़रूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि पुराना ज़माना पुराना था, वह बीत गया। अब ज़माना बदल गया है। नये दौर और नये ज़माने की ज़रूरतें नई होती हैं, समस्याएं नई होती हैं और नई समस्याओं के समाधान पुराने नहीं हो सकते।

अलग-अलग समय में अलग-अलग चीजों का महत्व होता है। कभी बड़ी जनसंख्या एक वरदान था क्योंकि उससे श्रमशक्ति बढ़ जाती थी, फिर एक ज़माना ऐसा आया जब ज़मीन और खेती संपदा के कारण बने। उसके बाद कारखाने और मिल बड़ी संपदा बन गए। आज के ज़माने में सूचना, ज्ञान और नेटवर्किंग संपदा हैं। पुराना ज़माना बीत जाए तो उसकी यादों से चिपके रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। अपने अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को सुखद बनाना तो सार्थक है पर सुनहरे अतीत पर घमंड करना और वर्तमान की उपेक्षा करना हानिकारक है। समस्या यह है कि भारतवर्ष में सोने की चिडिय़ा के अतीत की कहानियां सुनना-सुनाना तो आम बात है पर वर्तमान का विश्लेषण करना और नये ज़माने की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को शिक्षित करना, योजना बनाना और कार्य संपन्न करना शायद दूसरी दुनिया के लोगों पर छोड़ दिया गया है।

हम सोने की चिडिय़ा थे। हमने शून्य का आविष्कार किया, गिनती उसी से बनी। पुरातन काल में हमारा विज्ञान उन्नत था। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि पांच हज़ार वर्ष पूर्व भी हमारे यहां विमान थे। ऐसा माना जाता है कि रावण के पास पुष्पक विमान था और वह दूर की यात्राएं वायुमार्ग से करता था। हमारी युद्ध कला बहुत उन्नत थी, हमारे योद्धाओं के पास अग्निबाण जैसे आग बरसाने वाले या पानी बरसाने वाले या नागपाश की तरह बांध लेने वाले अस्त्र-शस्त्र थे। हमारी चिकित्सा पद्धति भी बहुत उन्नत थी। हमारे वैज्ञानिक, भूगोलविद्, खगोलविद् आदि विद्वानों ने संसार को ज्ञान और आविष्कारों का एक बड़ा खज़ाना दिया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। हमें अपनी विरासत पर गर्व होना ही चाहिए। इसमें कुछ भी गलत अथवा अस्वाभाविक नहीं है। पर क्या इतना ही काफी है?

श्री नारायणमूर्ति उन गिने-चुने भारतीयों में से एक हैं जो पूर्ण पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। खुद उनका जीवन एक खुली किताब है। वे एक अच्छे इन्सान ही नहीं, एक आदर्श देशभक्त भी हैं और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे वे न करते हों, या जिसे करने में वे विश्वास न करते हों। श्री नारायणमूर्ति ने अनेक बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, दक्षिणपंथियों, मध्यमार्गियों, वामपंथियों से बात की, अध्ययन किया, निरीक्षण किया, डाटा इकट्ठा किया और दुनिया में गरीबी मिटाने और आर्थिक विकास के मूलभूत उपायों का विश्लेषण करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले। उनका निष्कर्ष था कि गरीबी की समस्या का एकमात्र समाधान अच्छी आय वाली नौकरियों के अवसर पैदा करना है। इसके लिए ऐसे उद्यमी चाहिएं जो धारणाओं को अवसर और धन में बदल सकें। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और तथाकथित बिजनेस स्कूल भी विद्यार्थियों को नौकरी के लिए या अच्छे वेतन वाली नौकरी के लिए तो तैयार करते हैं पर वे उन्हें उद्यमी नहीं बनाते। ज्यादातर शिक्षित व्यक्ति क्लर्क, अफसर, मैनेजर या चीफ मैनेजर बनने का सपना देखते हैं, उद्यमी बनने का नहीं। नौकरीपेशा व्यक्ति को सिर्फ स्वयं को रोजगार मिलता है जबकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई अन्य लोगों के रोज़गार का भी कारण बनता है। गरीबी दूर करने का यह रामबाण उपाय है।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि विकास गरीबों की कीमत पर नहीं हो सकता। हमें सहृदय पूंजीवाद और इन्क्लूसिव डेवेलपमेंट को अपनाना होगा। ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिएं जो आम लोग खरीद सकें। इसके साथ ही गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाने के ठोस उपाय भी किये जाएं। रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाने के अलावा उत्पादन और वितरण का ऐसा माडल तैयार करना होगा जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े और सामान भी सस्ते हों। यह नयी सामाजिक व्यवस्था, दृष्टिकोण में परिवर्तन तथा सोशल इन्नोवेशन से संभव है। आम आदमी, सामाजिक संगठन और कारपोरेट घराने ऐसा कर सकते हैं।

जब मैं सामाजिक व्यवस्था की बात करता हूं तो मेरी कल्पना में राजा अग्रसेन आते हैं जिनके राज्य में यह नियम था कि यदि वहां कोई बाहरी व्यक्ति आये तो राज्य का हर व्यक्ति उसे एक रुपया और एक ईंट भेंट स्वरूप देता था ताकि उन ईंटों से वह अपना घर बना सके और उन रुपयों से अपना व्यवसाय जमा सके। यह एक सामाजिक व्यवस्था थी जहां हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति की सफलता के लिए योगदान देता था। इसी तरह सहृदय पूंजीवाद के माध्यम से वंचितों के विकास के लिए साधन बनाने होंगे। सहृदय पूंजीवाद में लाभ के धन का एक भाग समाज और देश के विकास में लगता है। यह तभी संभव है जब हम ‘चाहिए’ का व्याकरण छोड़कर ‘मैं करूंगा’ का व्याकरण अपना लें, तभी हम उन्नति कर सकेंगे और एक विकसित देश बन सकेंगे। 



सोशल मीडिया का नया युग




सोशल मीडिया का नया युग
          -- पी. के. खुराना

The Dawn of a New Era in Social Media
By : PK Khurana

(pkk@lifekingsize.com)

कंप्यूटर का आविष्कार एक चमत्कार था, इंटरनेट एक और चमत्कार था और इसके बाद सोशल मीडिया भी एक चमत्कार था। एक और वेबसाइट टॉक2सेलेब्स.कॉ(talk2celebs.com) ने सोशल मीडिया में एक नये युग की शुरुआत की है। इसे ज़रा विस्तार से समझने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया के इस ज़माने में हम ब्लॉग, फेसबुक, आर्कुट, नेटलॉग, ट्विटर आदि सोशल मीडिया साइटों के ज़रिये हम दुनिया भर से जुड़ गए हैं और हमारे मित्रों की संख्या हज़ारों में भी हो सकती है। सूचनाओं के प्रसार की गति अविश्वसनीय रूप से तेज़ हो गई है और सोशल मीडिया जनमत बनाने या जनमत को प्रभावित करने का एक उपयोगी और कारगर हथियार बन कर उभरा है। इंटरनेट और ईमेल ने हमारे जीवन के ढंग में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया था पर सोशल मीडिया ने तो एक कदम आगे जाकर सारी दुनिया को हमारी दहलीज पर ला दिया है। सोशल मीडिया ने कई सार्थक बहसों को जन्म दिया है और कई सामाजिक अभियानों को मजबूती प्रदान की है। हम सोशल मीडिया से जुड़े हों या न, हम सोशल मीडिया के पक्ष में हों या विरोध में, पर यह अब हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है और हम इससे बच नहीं सकते।

इंटरनेट, सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की त्रिवेणी ने अब एक ऐसी शक्तिपीठ की रचना की है कि उसके सामने पारंपरिक मीडिया का तेज फीका पड़ गया है। प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध एवं विशिष्ट व्यक्तियों के लिए ट्विटर को अपनाना इसलिए आसान था क्योंकि यहां केवल 140 अक्षरों में ही अपनी बात समाप्त कर देने की स्वतंत्रता है, जो कहीं और संभव नहीं थी। सोशल नेटवर्किंग साइटों पर, बिना किसी खर्च के, मित्रों और प्रशंसकों के माध्यम से सेकेंडों में करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की सुविधा ने इसे एकदम से ग्राह्य बना दिया।

एक तरफ सोशल मीडिया ने प्रसिद्ध लोगों को अपने प्रशंसकों से जुड़ने का अवसर दिया तो दूसरी तरफ प्रशंसकों और सामान्य जन को भी प्रसिद्ध लोगों के मन में झांकने और उनके विचार जानने का मौका मिला। स्टार और सेलेब्रिटी माने जाने वाले विशिष्ट व्यक्ति पहले तो वेबसाइट और ब्लॉग के माध्यम से लोगों से जुड़े, परंतु वहां पहुंच सीमित थी क्योंकि जो व्यक्ति आपकी वेबसाइट पर नहीं आया, उसे आपके बारे में जानने का मौका नहीं मिलता था। फिर आर्कुट और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों ने तो जैसे धूम ही मचा दी। फेसबुक के साथ ही यूट्यूब, फ्लिकर और ट्विटर की लोकप्रियता भी बढ़ती चली गई और सोशल मीडिया साइटें हमारी जीवन का अभिन्न अंग बन गईं। हाल ही में पिंटेरेस्ट की चर्चा भी बढ़ी है, हालांकि अभी उसे सेलेब्रिटी स्टेटस नहीं मिला है। सोशल मीडिया साइटों में ट्विटर की अपनी अलग पहचान बन गई है क्योंकि व्यस्त लोगों के लिए भी अपने स्मार्टफोन से ही सिर्फ 140 अक्षरों में अपनी बात ट्वीट कर देने के लिए समय निकालना कठिन नहीं है और कई सेलेब्रिटीज़ तो दिनमें कई-कई बार ट्वीट करते हैं। अब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज लगभग सभी विशिष्टजन ट्वीट की भाषा में बोलते हैं, और उनके करोड़ों-करोड़ों प्रशसंक पूरी निष्ठा से उनके ट्वीट पढ़ते हैं, उस पर चर्चा करते हैं, टिप्पणी करते हैं, टिप्पणियों पर टिप्पणी करते हैं। अपने मनपसंद सेलेब्रिटी से दोतरफा संवाद का ऐसा और कोई माध्यम नहीं है।

अमरीकी गायिका लेडी गागा के ट्विटर एकाउंट पर प्रशंसकों की संख्या 2,78,48,540 है जो सऊदी अरेबिया, आस्ट्रेलिया और ग्रीस की सम्मिलित आबादी से भी ज़्यादा है। कनाडा की पॉप संगीतकार जस्टीन बीबर के ट्विटर एकाउंट पर प्रशंसकों की संख्या 2,59,33,400 है। अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ट्विटर पर सर्वाधिक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ हैं और उनके प्रशंसकों की संख्या 1,80,99,382 है जबकि फुटबाल खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के ट्विटर एकाउंट पर उनके प्रशंसकों की संख्या 1,20,73,467 है। भारतवर्ष में लोककथाओं के नायकों की मानिंद प्रसिद्ध अमिताभ बच्चन के हर ट्वीट को पढ़ने के लिए 31,78,881 लोगों का बड़ा समूह हमेशा बेताब दिखता है। अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और बालीवुड के बादशाह शाहरुख खान के ऑनलाइन प्रशंसकों की संख्या भी बहुत से नामी-गिरामी अखबारों से बहुत-बहुत ज्यादा है।

जैसे-जैसे मध्यवर्ग का विस्तार हो रहा है, मोबाइल फोन धारकों की संख्या बढ़ती जा रही है। मोबाइल फोन सस्ते होते जा रहे हैं और स्मार्टफोन अब एक आम चीज़ हैं। अब तो बहुत से 3-जी कंपैटिबल फोन भी इतने सस्ते हैं कि हर कोई उन्हें खरीद सकता है। इसके कारण भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है। सोशल मीडिया के इस उपभोग का ही परिणाम है कि अब प्रसिद्ध व्यक्तियों के ऑनलाइन प्रशंसकों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि ये सेलेब्रिटी हस्तियां स्वयं एक माध्यम बनकर खुद भी 'मीडिया' की श्रेणी में आ गए हैं।

बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सदैव नई सुविधाओं, सेवाओं और उत्पादों की आवश्यकता रही है और विश्व में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं रही जो नई आवश्यकताओं को समझ कर नई सुविधा, नई सेवा या नए उत्पाद प्रस्तुत करते रहे हैं और उसे दुनिया ने हाथों-हाथ लिया है। इसी तरह की एक वेबसाइट टॉक2सेलेब्स.कॉम है। इस वेबसाइट की खासियत यह है कि इसमें दुनिया भर के सेलेब्रिटीज़ के फेसबुक, ट्विटर, नेटलॉग, आर्कुट व यूट्यूब आदि लिंक शामिल हैं जहां आप किसी भी सेलेब्रिटी के सोशल मीडिया साइट पर उनसे चैट कर सकते हैं, कमेंट कर सकते हैं, कमेंट पर कमेंट कर सकते हैं और उसे अपने मित्रों के साथ शेयर कर सकते हैं। टॉक2सेलेब्स.कॉम के साथ सोशल मीडिया का एक और नया युग (The Dawn of a New Era in Social Media) शुरू हुआ है। सेलेब्रिटीज़ के विचारों और कामों से समाज प्रभावित होता है, प्रेरित होता है। टॉक2सेलेब्स.कॉम ने पहली बार सभी सेलेब्रिटीज़ को एक ही मंच पर ला दिया है। यही नहीं इसमें हॉलीवुड, बॉलीवुड, राजनीति, व्यवसाय, पत्रकारिता, कला, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों के विशिष्ट जनों का समावेश है।

सोशल मीडिया की खासियत यह है कि इसके माध्यम से आप समाचार पा सकते हैं और समाचार दे सकते हैं। यह दो-तरफा संवाद है जहां आपको दुनिया भर की खबरें मिलती हैं और आप दुनिया भर को अपनी खबर दे सकते हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि सोशल मीडिया ऐसा अखबार है जिसे खरीदना नहीं पड़ता और जिसके प्रकाशन पर भी आपको कोई खर्च नहीं करना पड़ता। इसके अलावा सोशल मीडिया के माध्यम से आप दुनिया के हर कोने से एक साथ जुड़ जाते हैं। सोशल मीडिया की इसी खूबी ने इसे इतना खास बना दिया है कि सारी दुनिया सोशल मीडिया में सिमट गई है। इसी कड़ी में टॉक2सेलेब्स.कॉम ने एक नये युग की शुरुआत तो की है, पर क्या यह किसी अगले चमत्कार की वजह भी बन पायेगा? यह देखना अभी बाकी है कि इस कड़ी का अगला चमत्कार क्या होगा। ***

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Saturday, April 14, 2012

Well-in-time Day :: वैल-इन-टाइम डे





वैल-इन-टाइम डे
• पी.के. खुराना

हमने पश्चिम से बहुत कुछ सीखा है। बहुत-से मामलों में हम सिर्फ नकल ही कर रहे हैं, जबकि कई अन्य मामलों में हमने सिर्फ नकल से आगे बढ़कर उस कार्य-संस्कृति को भी आत्मसात किया है या काम के पीछे की कहानी को भी समझा और अपनाया है। इस बात का खुलासा करूं तो शायद तमिलनाडु के शहर मदुरै में स्थित अरविंद आई हास्पिटल का उदाहरण सर्वाधिक सटीक है। अरविंद आई हास्पिटल की अंतरराष्ट्रीय पहचान है क्योंकि यह लगभग न के बराबर के खर्च में आंखों के इलाज और अंधता दूर करने के मिशन से काम कर रहा है।

अरविंद आई हास्पिटल मात्र लाभ के लिए काम करने के बजाए जनसेवा की भावना से काम कर रहा है और आज यह मात्र एक अस्पताल नहीं बल्कि एक ख्यात जनसेवा संस्थान के रूप में जाना जाता है। अरविंद आई हास्पिटल में कार्यरत डाक्टर अन्य अस्पतालों के डाक्टरों की अपेक्षा कहीं ज्य़ादा आप्रेशन करते हैं। इस प्रकार ज्यादा कुशलता (एफिशेन्सी) के कारण इस इकोनामी आफ स्केल का लाभ मिलता है, यानी इसका लाभ ज्यादा मार्जिन में नहीं बल्कि ज्य़ादा से ज्य़ादा संख्या में आप्रेशन करने में है। जनसेवा की भावना का प्रत्यक्ष उदाहरण इस बात में है कि अरविंद आई हास्पिटल विश्व के किसी भी अन्य अस्पताल को अपने मैनेजमेंट सिस्टम दिखाने और बताने से गुरेज़ नही करता, तो भी उनका अनुभव यह है कि अन्य अस्पतालों से आये लोग ‘तकनीक’ तो समझ लेते हैं, पर अरविंद आई हास्पिटल की आत्मा, यानी संस्कृति को नहीं अपनाते, यही कारण है कि वे इस शानदार प्रबंधन प्रणाली का पूरा लाभ नहीं ले पाते। रणबीर कपूर की प्रसिद्ध फिल्म ‘राकेट सिंह’ भी यही संदेश दोहराती है कि किसी काम को पूर्णता में सीखने-समझने में ही लाभ है। पश्चिम से सीखी जाने वाली बातों पर भी यही नियम लागू होता है।

जगद्गुरू कहे जाने वाले भारतवर्ष में अब हम ज़ोर-शोर से मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे आदि मनाने लग गए हैं। पिछले कई वर्षों की तरह इस वर्ष भी देश के कई हिस्सों में 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे ज़ोर-शोर से मनाया गया। प्यार के फरिश्ते संत वैलेटाइन की स्मृति में मनाए जाने वाले इस दिन को मीडिया ने और भी ज्य़ादा उत्साह से मनाया। भारतवर्ष के लिए यह सिलसिला अब नया नहीं रहा। कोई भी ‘दिवस’ मनाने के पीछे एक उद्देश्य होता है, कभी वह पूर्वजों के बलिदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है, कभी बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न है और कभी रिश्तों की मजबूती का प्रयास या नए रिश्ते गढऩे का अवसर होता है।

पश्चिम से, या कहीं से भी अच्छी बातें सीखने में कोई बुराई नहीं है। दिमाग की खिड़की खुली रखने पर ही हम रोशनी अंदर आने दे सकते हैं। हमें भारत को जगद्गुरू कहने में गर्व होता है। जगद्गुरू बने रहने के लिए आंतरिक विकास एक आवश्यक शर्त है। आज जगद्गुरू भारत को हर अच्छी बात सीखने के लिए तैयार होना होगा, चाहे वह पश्चिम से आये या जापान, चीन अथवा ताइवान से।

पश्चिमी संस्कृति से समय की पाबंदी जीवन का एक हिस्सा है। भारतवर्ष में हम पश्चिम से मिलने वाली आसान चीजों की नकल कर रहे हैं लेकिन लाभदायक बातों को सीखने की कोशिश कुछ कम कर रहे हैं। समय की पाबंदी जीवन में सफलता के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन हमारी परियोजनाएं हमेशा अलग ही कहानी कहती हैं। कोई भी सरकारी परियोजना समय पर पूरी नहीं होती, समय पर पूरी न होने के कारण उनकी कीमत कई-कई गुणा बढ़ जाती है। बहुत-सी परियोजनाएं इसलिए अधर में लटक जाती हैं कि सत्तासीन दल बदल गया। भारतवर्ष में सरकारी परियोजनाओं में समय की पाबंदी का कोई महत्व नहीं है। सरकारी लोगों के लिए आई.एस.टी. का मतलब ‘इंडियन स्टैंडर्ड टाइम’ नहीं बल्कि ‘इंडियन स्ट्रैचेबल टाइम’ है। सरकारी डिक्शनरी वाले ‘समय’ को आप रबड़ की तरह जितना चाहें लंबा खींच सकते हैं।

स्ट्रैचेबल टाइम की इस फिलासफी ने भारत का बहुत नुकसान किया है। अनुशासनहीनता, काम के प्रति गैर-जिम्मेदारी का स्थाई भाव हमारी कार्य-संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। इसके इलाज के लिए अब हमें वैलेंडाइन डे की तरह ‘वैल-इन-टाइम-डे’ मनाना शुरू करने की आवश्यकता है।

जापान में सुनामी के समय कुछ अधिकारियों को रिएक्टरों को बंद करने का कार्य सौंपा गया। अपनी जान की परवाह किये बिना उन लोगों ने किस तल्लीनता और शालीनता से वह कर्तव्य निभाया, यह सारी दुनिया ने देखा। चीन और ताईवान का सामान दुनिया भर के बाजारों में कैसे बढ़त बना रहा है, यह हम सब के सामने है। भारतीय त्योहारों और भारतीय संस्कृति से जुड़ा चीनी और ताईवान सामान भारत भी इतना सटीक, उपयोगी और सार्थक होता है कि आश्चर्य होता है कि किसी भारतीय ने ऐसा क्यों नहीं सोचा?

लगभग 25 वर्ष पूर्व रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट’ में एक लेख छपा था जिसमें यह बताया गया था कि भारतवर्ष में अंग्रेजों के शासनकाल के समय में मुंबई (तब बंबई) म्युनिसिपल कारपोरेशन के भवन के निर्माण के लिए ठेका दिया गया। वह निर्माण तय समय से पूर्व पूरा हुआ, तय बजट से कम खर्च में पूरा हुआ और भवन के उद्घाटन के समय उस पर लगी उद्घाटन पट्टिका में उपरोक्त दोनों तथ्यों का जिक्र शामिल था। क्या इस उदाहरण से तथा चीन, जापान और ताईवान के उदाहरणों से हम कुछ सीख सकते हैं ?

हरियाणा में पूर्व मंत्री तथा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे श्री फूल चंद मुलाना समय की पाबंदी के लिए जाने जाते हैं। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आप समय की पाबंदी का नियम कैसे निभा पाते हैं, कैसे हर आयोजन में आप समय पर पहुंच जाते हैं। इसका उत्तर दिखने में जितना साधारण था, उन शब्दों में उतनी ही गहराई भी है। श्री मुलाना ने मुझे कहा, “मैं वैसे ही हर जगह समय पर पहुंचता हूं, जैसे हर दूसरा आदमी देर से पहुंचता है!” उनका अभिप्राय यह था कि समय पर पहुंचना उतना ही आसान है, जितना देर से पहुंचना, यानी समय की पाबंदी मात्र एक आदत है। शुरू में हर आदत अनुशासन से बनती है, बाद में वह सिर्फ एक आदत होती है और हमारा अवचेतन मस्तिष्क उसे अपना लेता है तो वह सामान्य रुटीन बन जाती है।

मैं फिर कहना चाहूंगा कि पश्चिम से, या कहीं से भी अच्छी बातें सीखने में कोई बुराई नहीं है। दिमाग की खिड़की खुली रखने पर ही हम रोशनी अंदर आने दे सकते हैं। हमें भारत को जगद्गुरू कहने में गर्व होता है। जगद्गुरू बने रहने के लिए आंतरिक विकास एक आवश्यक शर्त है। आज जगद्गुरू भारत को हर अच्छी बात सीखने के लिए तैयार होना होगा, चाहे वह पश्चिम से आये या जापान, चीन अथवा ताइवान से। ***

Well-in-time Day
by : PK Khurana
(Pramod Krishna Khurana)

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